प्लास्टिक फ्री बनाने की कसम! बीमार हुआ-लोगों ने जीभर मारे ताने ,अब गांव की तस्वीर बदल रहा पाली का चायवाला

Rajkumar Upadhyaya |  
Published : Jul 10, 2023, 07:11 PM ISTUpdated : Jul 11, 2023, 04:39 PM IST
प्लास्टिक फ्री बनाने की कसम! बीमार हुआ-लोगों ने जीभर मारे ताने ,अब गांव की तस्वीर बदल रहा पाली का चायवाला

सार

राजस्थान के पाली जिले के बिसलपुर गांव के एक चायवाले की मुहिम रंग लाई है। सिंगल यूज प्लास्टिक के खिलाफ चार साल पहले शुरु किये गए अभियान को अब युवा भी सपोर्ट कर रहे हैं। गांव को प्लास्टिक फ्री बनाने में स्थानीय लोगों ने भी कानजी चायवाले के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना शुरु कर दिया है।

जयपुर। सामान्य तौर पर लोग नमकीन, चिप्स वगैरह के प्लास्टिक कवर समेत प्लास्टिक गिलास, कप को यूज करने के बाद यूं ही इधर उधर फेंक देते हैं। यही प्लास्टिक पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है। भारत सरकार साल 2022 में 'सिंगल यूज प्लास्टिक' पर बैन भी लगा चुकी है। ज्यादातर लोग इसे अब भी गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। इसी बीच राजस्थान के पाली जिले का एक चायवाला अपने गांव को प्लास्टिक फ्री बनाने की मुहिम में जुटा हुआ है। 

प्लास्टिक के बदले देते हैं जरुरत की चीजें

राजस्थान के पाली जिले के कानाराम मेवाड़ा बिसलपुर गांव में चाय की दुकान चलाते हैं। उन्हें कानजी चाय वाले के नाम से भी जाना जाता है। वह गांव के लोगों से 'सिंगल यूज प्लास्टिक' लेते हैं और उसके बदले में उन्हें उनकी जरुरत की चीजें देते हैं। मसलन-बुजुर्गों को पौधे, बच्चों को पेन, पेंसिल, टिफिन बॉक्स, ज्योमेट्री बॉक्स और महिलाओं को प्लास्टिक के बदले तेल, कपड़े धोने वाला साबुन, नहाने वाला साबुन, ऑयल, शुगर आदि देते हैं।

रिसाइक्लिंग प्लांट भेजते हैं 'सिंगल यूज प्लास्टिक'

कानाराम कहते हैं कि पहले वह सोशल वर्क करते थे। गांव के ही दिलीप कुमार दानमलजी जैन ने उन्हें इस काम के लिए मोटिवेट और सपोर्ट किया। गांव से इकट्ठा होने वाले 'सिंगल यूज प्लास्टिक' को वह रिसाइक्लिंग प्लांट भेजते हैं। शुरु में उन्होंने प्लास्टिक से घरेलू वस्तु बनाई थी। डेढ़ साल तक लोगों को रोजगार देने का काम भी किया। पर वह मॉडल सफल नहीं हो सका, तो 'सिंगल यूज प्लास्टिक' को रिसाइक्लर को भेजना सही समझा।  

बच्चों को बताते हैं प्लास्टिक के नुकसान

कानाराम कहते हैं कि पहले यह काम शुरु किया था तो एक स्कीम शुरु की थी कि एक किलो प्लास्टिक लाइए और एक किलो शुगर पाइए। फिर धीरे-धीरे उसे कम कर दिया। 20 से 25 रुपये प्रति किलो कॉस्ट के हिसाब से लोगों को जो जरुरत होती है, वह देते हैं। स्कूल में बच्चों को सेशन भी देता हूॅं, उन्हें समझाता हूॅं कि प्लास्टिक से जल, जंगल और जमीन को कितना नुकसान होता है।  

फैमिली का नहीं मिला सपोर्ट

चार साल पहले जब उन्होंने यह काम शुरु किया था तो फैमिली का सपोर्ट नहीं मिला। लोगों ने कहा कि ये तुमने कौन सा काम शुरु कर दिया है, इसमें खतरा है। अच्छा नहीं लग रहा है। तू कचरा इकट्ठा कर रहा है, बीमार हो जाएगा। संयोग से काम शुरु करने के ठीक छह महीने बाद वह अचानक बीमार हो गए। उन्हें करीबन महीने भर के लिए अस्पताल में एडमिट होना पड़ा। घर वालों ने 'सिंगल यूज प्लास्टिक' इकट्ठा करने से मना किया कि ये काम मत करो, बीमार हो जाओगे, शरीर कमजोर है। फिर भी कानाराम मेवाड़ा ने हिम्मत नहीं हारी। जब अच्छा रिस्पांस आने लगा तो धीरे-धीरे उन्हें लोगों का सपोर्ट मिलना शुरु हो गया। कानजी चायवाले कहते हैं कि अब घर वाले भी समझ गए हैं, खुश हैं।

गांव में लगाएंगे रिसाइक्लिंग प्लांट

कानजी चायवाले कहते हैं कि उन्हें गांव वालों का भी सपोर्ट मिल रहा है। आसपास के युवा उन्हें सपोर्ट कर रहे हैं। वह एक-दूसरे को मोटिवेट करते हैं कि आप प्लास्टिक इधर मत फेंकिए। हालांकि जो प्लास्टिक कचरा वह रिसाइक्लिंग प्लांट को भेजते हैं। उसके बदले कानाराम को ज्यादा पैसा नहीं मिलता है, जबकि उनके पास महीने भर में 3 से 4 क्विंटल प्लास्टिक कचरा इकट्ठा हो जाता है। वह बताते हैं कि अब गांव में ही एक रिसाइक्लिंग प्लांट लगाने की योजना है।  

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