कुछ याद करो कुर्बानी: आज है आजादी के नायक चंद्रशेखर आजाद की पुण्यतिथि

Published : Feb 27, 2019, 10:29 AM IST
कुछ याद करो कुर्बानी: आज है आजादी के नायक चंद्रशेखर आजाद की पुण्यतिथि

सार

देश की आजादी और काकोरी कांड और 1929 बम कांड के नाम के नायक चंद्रशेखर आजाद की आज पुण्यतिथि है। आजाद बरतानवी पुलिस की हिटलिस्ट में थे। इतिहास के पन्नों उनके जीवन के बारे कई सच्चाई दर्ज नहीं हैं क्योंकि उस वक्त अंग्रेज सरकार थी और आजादी के बाद देश में बनी सरकारों ने भी उन्हें महत्व नहीं दिया और उनके बलिदान को भुला दिया। सच्चाई ये ही कि जब अल्फ्रेड पार्क में पुलिस और चंद्रशेखर आजाद के बीच फायरिंग चल रही थी तो आजाद ने किसी भी पुलिसकर्मी को अपनी गोली से निशाना नहीं बनाया क्योंकि वो भारतीय थे।

देश की आजादी और काकोरी कांड और 1929 बम कांड के नाम के नायक चंद्रशेखर आजाद की आज पुण्यतिथि है। आजाद बरतानवी पुलिस की हिटलिस्ट में थे। इतिहास के पन्नों उनके जीवन के बारे कई सच्चाई दर्ज नहीं हैं क्योंकि उस वक्त अंग्रेज सरकार थी और आजादी के बाद देश में बनी सरकारों ने भी उन्हें महत्व नहीं दिया और उनके बलिदान को भुला दिया। सच्चाई ये ही कि जब अल्फ्रेड पार्क में पुलिस और चंद्रशेखर आजाद के बीच फायरिंग चल रही थी तो आजाद ने किसी भी पुलिसकर्मी को अपनी गोली से निशाना नहीं बनाया क्योंकि वो भारतीय थे।

आजादी के नायक चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के झाबुआ ज़िले में हुआ था। उनके पूर्वज बदरका (वर्तमान उन्नाव जिला) से थे। आजाद के पिता पण्डित सीताराम तिवारी संवत् 1856 में अकाल के समय अपने पैतृक निवास बदरका को छोड़कर पहले कुछ दिनों मध्य प्रदेश अलीराजपुर रियासत में नौकरी करते रहे फिर जाकर भाबरा गाँव में बस गये। यहीं बालक चन्द्रशेखर का बचपन बीता। उनकी माँ का नाम जगरानी देवी था। आजाद का प्रारम्भिक जीवन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में स्थित भाबरा गाँव में बीता और वह बचपन भील बालकों के साथ खूब धनुष बाण चलाना सीखते थे।

घर में गरीबी के कारण आजाद शुरूआती शिक्षा-दीक्षा अच्छी नहीं हो पाई, लेकिन पढ़ना-लिखना उन्होंने गाँव के ही एक बुजुर्ग  मनोहरलाल त्रिवेदी से सीख लिया था। जो उन्हें घर पर निःशुल्क पढ़ाते थे। लेकिन आजाद ने पढ़ाई के लिए वाराणसी जाने का निश्चय किया और फिर वह वाराणसी आ गए । लेकिन इसी बीच देश की आजादी की भावना उनके दिल और दिमाग में हिलोरे मारने लगी लेकिन 1921 में बनारस के सत्याग्रह आंदोलन के दमन ने उनकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी। हालांकि चंद्रशेखर आजाद का क्रांतिकारी जीवन का केंद्र बिंदु झांसी रहा था। लेकिन उनके चर्चे पूरे देश में थे। अंग्रेज हुकुमत उन्हें पकड़ने के लिए कई बार कोशिश कर चुकी थी, लेकिन हमेशा ही विफल रही।

आजाद अपने जीवन में बहुत अधिक गोपनीयता रखते थे इस कारण वह आजीवन कभी भी पुलिस द्वारा पकडे नहीं गए थे। झांसी से 15 किलोमीटर की दूरी पर ओरछा के जंगलो में निशानेबाजी का अभ्यास करते रहते थे। वो अपने दल के दुसरे सदस्यों को भी निशानेबाजी के लिए प्रशिक्षित करते थे। उन्होंने सतर नदी के किनारे स्थित हनुमान मन्दिर के पास एक झोंपड़ी भी बनाई थी।  आजाद वहा पर पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी के सानिध्य में काफी लम्बे समय तक रहे थे और पास के गाँव धिमारपुरा के बच्चों को पढाया करते थे।  इसी वजह से उन्होंने स्थानीय लोगो से अच्छे संबंध बना लिए थे। मध्य प्रदेश सरकार ने आजाद के नाम पर बाद में इस गाँव का नाम आजादपूरा कर दिया था।

आजाद ने  भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के साथ मिलकर हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र सभा का गठन किया। आजाद ने काकोरी काण्ड में फरार होने के बाद से ही उन्होंने छिपने के लिए साधु का वेश बनाना बखूबी सीख लिया था और इसका उपयोग उन्होंने कई बार किया। उनकी मुलाकात युवा क्रांतिकारी प्रन्वेश चटर्जी से हुई जिन्होंने उनकी मुलाकात राम प्रसाद बिस्मिल से करवाई, जिन्होंने हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की स्थापना की थी, यह एक क्रांतिकारी संस्था थी। आजाद हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन के सक्रीय सदस्य बन गए थे और लगातार अपने एसोसिएशन के लिये चंदा इकठ्ठा करने में जुट गए। 

अल्फ्रेड पार्क में हुई मुठभेड़ के वक्त की ब्रिटिश सरकार द्वारा दर्ज की रिपोर्ट के मुताबिक अपराध संख्या, अभियुक्त का नाम और धारा-307 (क़ातिलाना हमला) और नतीजे में अंतिम रिपोर्ट का विवरण देती है। इससे साफ होता है कि आजाद ने पुलिस पार्टी पर क़ातिलाना हमला किया और इसके जवाब में पुलिस ने भी फायरिंग की। लिहाजा पुलिस की आत्मरक्षार्थ कार्रवाई में अभियुक्त की मौत हो गई। हालांकि सच्चाई इससे परे है। क्योंकि कहा ये जाता है कि आज़ाद के पास एक गोली बची, तो उन्होंने ख़ुद को गोली मार ली। हालांकि अभी तक ऐसे कोई भी दस्तावेज सरकार या फिर किसी व्यक्ति के पास नहीं हैं।

क्योंकि इलाहाबाद के ज़िलाधिकारी परिसर में मौजूद फ़ौजदारी के अभिलेखागार में 1970 से पहले का दस्तावेज़ नहीं है। जानकारी के मुताबिक 27 फ़रवरी 1931 को जब एल्फ़्रेड पार्क में चंद्रशेखर आज़ाद, जामुन के पेड़ के नीचे एक साथी के साथ कुछ बातचीत कर रहे थे। तभी एक मुखबिर की सूचना पर डिप्टी एसपी ठाकुर विश्ववेश्वर सिंह और पुलिस अधीक्षक सर जॉन नॉट बावर ने पूरे पार्क को घेरा और आजाद से आत्म समर्पण करने को कहा। बावर ने पेड़ की आड़ लेकर चंद्रशेखर आज़ाद पर गोली चलाई जो उनकी जांघ को चीरकर निकल गई जबकि दूसरी गोली विश्ववेश्वर सिंह ने चलाई तो ये गोली उनकी दाहिनी बांह में लगी। हालांकि आजाद घायल थे, लेकिन उसके बावजूद आज़ाद लगातार बाएं हाथ से गोली चलाते रहे। हालांकि इस गोलीबारी में सिर्फ आजाद को ही गोली नहीं लगी बल्कि उनकी जवाबी गोली विश्ववेश्वर सिंह के जबड़े में लगी। जबकि आज़ाद ने किसी पुलिसकर्मी को निशाना नहीं बनाया क्योंकि वो सब भारतीय थे।

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