बदल रहा है मानसून का पैटर्न, कमजोर प्री-मानसून से महाराष्ट्र में सूखे की स्थिति

Published : Jun 02, 2019, 06:56 PM IST
बदल रहा है मानसून का पैटर्न, कमजोर प्री-मानसून से महाराष्ट्र में सूखे की स्थिति

सार

भारतीय मौसम विभाग के जारी आंकड़ों के मुताबिक 1954 के बाद प्री मानसून बारिश से सूखे की स्थिति के गिने चुने मौके रहे हैं जब प्री-मॉनसून में इतनी कम बारिश हुई है। आंकड़ों के मुताबिक 1954 में महज 93.9 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई थी

पूरे देश में मानसून का इंतजार बेसब्री से शुरू हो चुका है वहीं समूचा उत्तर भारत भीषण गर्मी और लू की चपेट में है। मौसम विभाग ने बीते महीने अनुमान जारी किया था कि इस साल मानसून एक सप्ताह की देरी के साथ केरल दस्तक देगा और अनुमान के मुताबिक उत्तर भारत को राहत के लिए कम से कम 15 से 20 दिनों का लंबा इंतजार करना पड़ेगा। 

इसके अलावा अब मौसम विभाग का ताजा आंकड़ा बता रहा है कि मानसून में देरी के साथ परेशान करने वाला आंकड़ा प्री-मानसून बारिश का मिल रहा है। अभी तक महज 99 मिलीमीटर की बारिश रिकॉर्ड हुई है और मौसम विभाग के रिकॉर्ड के मुताबिक ऐसा बीते 65 साल में पहली बार देखने को मिल रहा है। आकंड़ों के मुताबिक प्री-मानसून के आंकड़ों में सूखे की स्थिति पैदा हो चुकी है।

भारतीय मौसम विभाग के जारी आंकड़ों के मुताबिक 1954 के बाद प्री मानसून बारिश से सूखे की स्थिति के गिने चुने मौके रहे हैं जब प्री-मॉनसून में इतनी कम बारिश हुई है। आंकड़ों के मुताबिक 1954 में महज 93.9 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई थी और फिर 2009 में प्री मानसून बारिश में सिर्फ 99 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई थी। वहीं 2012 में भी प्री मानसून बारिश सिर्फ 90.5 मिलीमीटर दर्ज हुई थी।

मौसम विभाग के आंकड़ों में बारिश का सबसे कम औसत मध्य महाराष्ट्र, मराठवाड़ा और महाराष्ट्र के ही विदर्भ इलाके में हुआ है। वहीं कोंकण-गोवा, गुजरात के सौराष्ट्र और कच्छ इलाके में भी यही स्थिति देखने को मिली है। तटीय कर्नाटक, तमिलनाडु और पुदुचेरी जैसे इलाकों में भी प्री-मानसून बारिश उम्मीद से कमजोर रही है। खासतौर पर महाराष्ट्र और सेंट्रल भारत में 1954 के बाद बारिश में इतनी बड़ी गिरावट देखने को मिली है।

क्लाइमेंट ऐप्लिकेशन ऐंड यूजर इंटरफेस के पुलक गुहाठाकुरता ने बताया, ‘रिसर्च के मुताबिक पिछली सदी में पश्चिमी भारत में प्री-मॉनसून बारिश में काफी तेजी से गिरावट आई है। खासतौर पर महाराष्ट्र में यह समस्या और बढ़ी है।‘ गुहाठाकुरता ने कहा, 'हालांकि अब तक पूरे देश में इस तरह का ट्रेंड देखने को नहीं मिला है। यह एक तरह से मॉनसून सीजन में बदलाव का पैटर्न है।' 
 

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