बिना Smoking के ही 50% पेशेंट्स हैं लंग कैंसर का शिकार, जानिए कैसे भारतीयों में फैल रहा है फेफड़ों का कैंसर

Bhawana tripathi |  
Published : Jul 12, 2024, 10:44 AM ISTUpdated : Jul 12, 2024, 10:46 AM IST
बिना Smoking के ही 50% पेशेंट्स हैं लंग कैंसर का शिकार, जानिए कैसे भारतीयों में फैल रहा है फेफड़ों का कैंसर

सार

Lung Cancer Hits Non Smoking Indians: भारत में सालाना लंग कैंसर के 72,510 मामले आते हैं जिनमें 66,279 मौतें हो जाती हैं। इनमें 50 % लोग स्मोकिंग न करने वाले होते हैं। वहीं वेस्टर्न देशों के मुकाबले भारत में 10 साल पहले ही व्यक्ति को फेफड़ों का कैंसर डायग्नोज हो जाता है। 

हेल्थ डेस्क: 'द लैसेंट' ने लंग कैंसर को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। इंडिया में लंग कैंसर से जूझने वाले लोगों की उम्र वेस्टर्न देशों के पेशेंट्स से 10 साल कम है। हैरत में डालने वाली बात ये है कि भारतीय लंग कैंसर के पेशेंट्स बिना स्मोकिंग वाले हैं। 

द लैसेंट पत्रिका में प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया है कि पश्चिमी देशों के मुकाबले भारत में लंग कैंसर 10 साल पहले ही डायग्नोज हो जाता है। उदाहरण से समझिए कि अगर वेस्टर्न देशों में किसी को 50 साल में फेफड़ों का कैंसर हुआ है तो भारत में 40 साल में ही व्यक्ति लंग कैंसर से पीड़त हो रहा है। रिपोर्ट में बताया गया है कि लंग कैंसर के डायग्नोज की एवरेज एज 54 साल से 70 साल के बीच है।

बिना ल्मोकिंग के इन कारणों से होता है लंग कैंसर

टाईम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित रिपोर्ट में ऑन्कोलॉजी विभाग (टाटा मेडिकल सेंटर) के डॉ. कुमार प्रबाश ने अहम जानकारी दी। डॉ. कुमार प्रबाश कहते हैं कि ये हैरत में डालने वाली बात है कि फेफड़ों के कैंसर के 50% रोगी धूम्रपान नहीं करते हैं। स्टडी में ये बात सामने आई है कि बिना स्मोकिंग के लंग कैंसर निम्न कारणों से हो सकता है।

1.वायु प्रदूषण (क्रोमियम, कैडमियम, आर्सेनिक, कोयला)
2.सेकेंड हैंड स्मोकर
3.अनुवांशिक कारण
4.हॉर्मोनल कंडीशन
5.फेफड़ों की बीमारी

भारत में विदेशों के मुकाबले कम है लंग कैंसर का अनुपात

अगर विदेशों के मुकाबले भारत में लंग कैंसर के पेशेंट का अनुपात देखा जाए तो यहां लंग कैंसर के पेशेंट्स कम हैं। अमेरिका में लंग कैंसर का इंसिडेंट रेट 1000 में 30 है वहीं भारत में इनकी संख्या 1000 में 6 है। लेकिन अगर भारत की 6% आबादी की संख्या निकाली जाती है तो यह अमेरिका के मुकाबले ज्यादा ही होगी। भारत में टीबी की गंभीर बीमारी भी भयावह  रूप ले लेती है। लोगों को काफी समय बाद बीमारी का पता चलता है। जब तक डॉक्टर के पास आते हैं तो स्थिति गंभीर हो चुकी होती है।

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