Mahakumbh 2025: जानिए कैसे हजारों ग्रामीण महिलााओं को आत्मनिर्भर बना रहा महाकुंभ?

Rajkumar Upadhyaya |  
Published : Dec 16, 2024, 11:24 PM IST
Mahakumbh 2025: जानिए कैसे हजारों ग्रामीण महिलााओं को आत्मनिर्भर बना रहा महाकुंभ?

सार

जानिए कैसे प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ 2025, 15000 से अधिक ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक आत्मनिर्भरता की ओर ले जा रहा है। पारंपरिक उपले और मिट्टी के चूल्हों की बढ़ती मांग ने उनकी आजीविका को नया आयाम दिया है।

महाकुम्भ नगर। जनवरी 2025 में प्रयागराज में आयोजित होने वाला महाकुंभ न केवल आस्था और अध्यात्म का सबसे बड़ा आयोजन है, बल्कि यह लाखों लोगों के लिए आजीविका का जरिया भी बन गया है। खासतौर पर ग्रामीण महिलाओं के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता का एक बड़ा माध्यम भी बन रहा है। 

15,000 से अधिक महिलाएं महाकुंभ की तैयारियों में जुटी 

महाकुंभ नगर के अंतर्गत आने वाले 67 गांवों में रहने वाली 15,000 से अधिक महिलाएं आज महाकुंभ की तैयारियों में जुटी हुई हैं। ये महिलाएं उपले और मिट्टी के चूल्हे जैसे ट्रेडिशनल प्रोडक्ट तैयार कर रही हैं, जिनकी महाकुंभ में भारी डिमांड है। यह न केवल उनकी आर्थिक स्थिति को सुधार रहा है, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर भी बना रहा है।

उपलों और मिट्टी के चूल्हों की बढ़ी डिमांड

गंगा और यमुना के किनारे बसे गांवों में उपलों की मांग में जबरदस्त वृद्धि हुई है। हेतापट्टी गांव की सावित्री बताती हैं कि महाकुंभ में शिविर लगाने वाली संस्थाओं से उन्हें लगातार उपले सप्लाई करने के ऑर्डर मिल रहे हैं। बड़ी संख्या में महिलाएं गोबर से बने उपले तैयार करने में दिन-रात जुटी हुई हैं। वहीं की सीमा बताती हैं कि महाकुंभ में कल्पवासियों के लिए मिट्टी के चूल्हों की भारी डिमांड है। अब तक उनके पास 7,000 से अधिक चूल्हों का ऑर्डर आ चुका है। 

क्यों बढ़ी उपलों और मिट्टी के चूल्हों की डिमांड?

दरअसल, ये चूल्हे कल्पवासियों के लिए भोजन तैयार करने का मुख्य साधन हैं, क्योंकि महाकुंभ की परंपरा के अनुसार, श्रद्धालु पवित्रता और पारंपरिक तरीकों से ही खाना बनाना पसंद करते हैं। महाकुंभ मेला प्रशासन ने इस बार हीटर और छोटे गैस सिलेंडरों के उपयोग पर रोक लगाई है। यह निर्णय मेला क्षेत्र में आग लगने की घटनाओं को रोकने के लिए लिया गया है। इसी कारण, पारंपरिक उपलों और मिट्टी के चूल्हों की मांग में तेजी आई है। धर्माचार्यों और साधु-संतों के शिविरों में उपले और चूल्हों का उपयोग पवित्रता और परंपरा के अनुरूप अधिक उपयुक्त माना जा रहा है।

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