
सोनभद्र।चीन में एशियन गेम्स में पैदल 35 किलोमीटर पैदल चाल में मंजू रानी के साथ कांस्य पदक जीतने वाले रामबाबू का जीवन हमेशा से संघर्ष में गुजरा । उन्होंने कभी मनरेगा में मजदूरी की तो कभी होटल में वेटर का काम किया। गांव के कच्चे मकान में रहकर बड़े सपने देखे। रामबाबू की मां हमेशा कहती थी मेरा बेटा बड़ा इंसान बनेगा। माय नेशन हिंदी से रामबाबू ने अपनी जर्नी शेयर की
कौन है रामबाबू
रामबाबू सोनभद्र के रहने वाले हैं उनके पिता छोटेलाल खेतिहर मजदूर हैं। हर महीने तीन हजार रुपए कमाते हैं। परिवार में 6 लोग हैं रामबाबू इकलौते बेटे हैं रामबाबू की तीन बहने हैं। तीन हज़ार में 6 लोगों छह लोगों को पालना बहुत मुश्किल वाला काम था । रामबाबू गांव के प्राथमिक विद्यालय से प्रारंभिक शिक्षा पास करके नवोदय विद्यालय चले गए। गांव के कच्चे खपरैल के मकान में रामबाबू अपने परिवार के साथ रहते हैं। बचपन से ही उन्हें खेलों में दिलचस्पी थी। बात करते हुए रामबाबू ने बताया कि मैं पढ़ने में बहुत अच्छा नहीं था लेकिन स्पोर्ट्स में हमेशा से इंटरेस्ट था इसलिए मैं खेल में ही अपना कैरियर बनाना चाहता था।
स्कूल के हॉस्टल में ओलंपिक पदक विजेताओं की खबर देखते थे रामबाबू
नवोदय विद्यालय में रामबाबू का पढ़ाई में बिल्कुल भी मन नहीं लग रहा था। जो कुछ पढ़ाया जाता था वह उनके सिर से गुजर जाता था। इस विद्यालय में 2 साल रहने के दौरान रामबाबू ने हॉस्टल में ओलंपिक मेडलिस्ट की खबरें देखी जिसमें मैरी कॉम, साइना नेहवाल, गगन नारंग जैसे खिलाड़ियों को मेडल जीतते हुए देखा। इन विजेताओं की खबर रामबाबू अखबार में पढ़ते और उसकी कटिंग अपने पास रख लेते थे। रामबाबू के दिमाग में कहीं ना कहीं ओलंपिक में हिस्सा लेने का कीड़ा दौड़ रहा था। और उन्होंने फैसला किया कि वह ओलंपिक में हिस्सा लेंगे।
गांव की पगडंडी पर दौड़ना शुरू किया रामबाबू ने
ओलंपिक में हिस्सा लेने के लिए रामबाबू ने गांव की पगडंडी पर दौड़ना शुरू कर दिया। संसाधन के अभाव में रामबाबू प्रेक्टिस करने के लिए बनारस चले गए। किसी भी स्टेडियम में प्रैक्टिस करने के लिए पैसे की जरूरत होती है जो रामबाबू के पास नहीं था। उन्होंने बनारस के एक होटल में वेटर का काम शुरू कर दिया। कोविड में जब होटल बंद हुआ तो रामबाबू गांव वापस आ गए। गांव जाकर पिता के साथ मनरेगा में तालाब खोदने की मजदूरी करने लगे। दो लोगों की कमाई से घर का खर्च थोड़ा बेहतर हो गया।
और राम बाबू बनाते चले गए रिकॉर्ड
कोविड खत्म हुआ तो रामबाबू भोपाल चले गए वहां फार्मर ओलंपियन बसंत बहादुर राणा ने रामबाबू को ट्रेनिंग देना शुरू किया। अपनी मेहनत के दम पर रामबाबू ने 35 किलोमीटर पैदल चल के राष्ट्रीय ओपन चैंपियनशिप में हिस्सा लिया जिसमें स्वर्ण पदक जीतने के साथ उन्हें नेशनल कैंप में जगह मिल गई। इसके बाद रामबाबू ने गुजरात में राष्ट्रीय खेल की पैदल चाल स्पर्धा में नए राष्ट्रीय रिकॉर्ड के साथ गोल्ड मेडल जीता। रामबाबू ने 35 किलोमीटर की दूरी को 2 घंटे 36 मिनट और 34 सेकंड में पूरा किया था। 15 फरवरी को रांची में आयोजित राष्ट्रीय पैदल चल चैंपियनशिप में रामबाबू ने अपना ही रिकॉर्ड तोड़ दिया और 2 घंटे 31 मिनट 36 सेकंड में 35 किलोमीटर की दूरी तय की। 25 मार्च को स्लोवाकिया में इंटरनेशनल स्पर्धा में रामबाबू ने 2 घंटे 29 मिनट 56 सेकंड में 35 किलोमीटर की दूरी तय की।
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