
सुप्रीम कोर्ट ने आर्मी से कहा है कि महिला अधिकारियों को कदर प्रताड़ित न कीजिए कि उन्हें कोर्ट आने को मज़बूर होना पड़े। 39 साल की एक लेफ्टिनेंट कर्नल ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि उसको ऐसी जगह ट्रांसफर किया गया है, जहां उसके बच्चे के लिए क्रेच की सुविधा नहीं है।
जबकि आर्मी ने कोर्ट को बताया कि महिला की पोस्टिंग से महज 15 मिनट की दूरी पर क्रैच की सुविधा दी गई है। पिछली सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरकार से कहा था कि आर्मी को ध्यान रखना चाहिए कि उसके महिला अधिकारियों को कम के लिए अनुकूल माहौल मिले।
न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने फैसला दिया है। मामले की सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल ने कोर्ट को बताया कि लेफ्टिनेंट कर्नल अन्नू डोगरा अपने शिशु को इस क्रेच में डाल सकती है और अपने आधिकारिक कर्तव्यों का प्रभावी ढंग से निर्वहन कर सकती है।
हालांकि उसने कहा है कि चूंकि आसपास के इलाके में पहले से ही एक क्रेच है, वे डोगरा के पति, जो एक सेना अधिकारी भी है और जोधपुर में डिप्टी एडवोकेट जनरल है, उनके साथ काम करने के लिए इच्छुक नही है।
डोगरा के वकील ने कोर्ट को बताया कि आशंका है कि 39 वर्षीय डोगरा को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने के लिए निशाना बनाया जा सकता है। भाटी ने यह भी कहा कि उनके खिलाफ संभावित जांच के संकेत मिले है।
डोगरा की याचिका में उनकी अस्थाई पोस्टिंग पर सवाल उठाया गया था, जिससे उन्हें कोर्ट मार्शल की कार्यवाही करने के लिए जोधपुर से नागपुर तक कि यात्रा करनी पड़े। कैम्पटी (नागपुर) में कार्यवाही ने उसे उसके शिशु बच्चे के साथ रहने के मौलिक अधिकार से वंचित कर दिया।
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