बगैर चुनाव लड़े सिक्किम में हो गए भाजपा के दस विधायक, बनी मुख्य विपक्षी पार्टी

Published : Aug 13, 2019, 06:30 PM IST
बगैर चुनाव लड़े सिक्किम में हो गए भाजपा के दस विधायक, बनी मुख्य विपक्षी पार्टी

सार

किसी भी राज्य में सबसे ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बनाने वाले राज्य के पूर्व सीएम पवन कुमार चामलिंग की पार्टी को आज बहुत बड़ा झटका लगा है। आज चामलिंग की पार्टी के दस विधायकों ने भाजपा का दामन थाम लिया है। चामलिंग की पार्टी ने लोकसभा चुनाव के साथ हुए चुनाव में 15 सीटों पर जीत दर्ज की थी। 

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी को सिक्किम में बढ़ी सफलता मिली है। यहां पार्टी को विधानसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली, लेकिन आज बगैर चुनाव लड़े भाजपा के दस विधायक बन गए हैं। यही नहीं राज्य में भाजपा अब मुख्य विपक्षी पार्टी भी बन गई है। असल में राज्य में पवन चामलिंग की सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट के दस विधायकों ने भाजपा का दामन थाम लिया है और उनकी पार्टी में पांच ही विधायक बचे हैं।

किसी भी राज्य में सबसे ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बनाने वाले राज्य के पूर्व सीएम पवन कुमार चामलिंग की पार्टी को आज बहुत बड़ा झटका लगा है। आज चामलिंग की पार्टी के दस विधायकों ने भाजपा का दामन थाम लिया है। चामलिंग की पार्टी ने लोकसभा चुनाव के साथ हुए चुनाव में 15 सीटों पर जीत दर्ज की थी। हालांकि इससे पहले वह राज्य में मुख्यमंत्री के पद पर थे। अब चामलिंग की पार्टी में उनके साथ ही महज चार विधायक बचे हैं। विधानसभा चुनाव के बाद पवन चामलिंग को ये दूसरा झटका लगा है।

आज दिल्ली में दस विधायकों ने भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा और महासचिव राम माधव की मौजूदगी में पार्टी की सदस्यता ली। जल्द ही चामलिंग को एक और झटका भाजपा देगी। राज्य में भाजपा के दस विधायक होने के बाद चामलिंग से नेता प्रतिपक्ष का भी दर्जा छिन जाएगा। राज्य में चामलिंग की पार्टी अब और ज्यादा कमजोर हो गई है। राज्य के विधानसभा में 32 सीटें हैं और सत्ता के पक्ष के बाद अब भाजपा के पास सबसे ज्यादा 10 विधायक हैं।

गौरतलब है कि पवन कुमार चामलिंग राज्य में लगातार 25 साल तक मुख्यमंत्री रहे और उनकी पार्टी ने लगातार पांच विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज राज्य में सरकार बनाई। लेकिन इस बार उन्हें चुनाव में सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा ने हरा दिया और वह 17 सीटों पर जीत दर्ज करने में कामयाब रही। जबकि एसडीएफ को 15 सीटों पर ही जीत मिली थी। जिसके बाद उन्हें विपक्ष में बैठना पड़ा था। हालांकि विधानसभा चुनाव में भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली थी। 

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