
नई दिल्ली। महाराष्ट्र में सरकार बनाने को लेकर सियासी सस्पेंस अभी भी कायम है। अभी तक शिवसेना को छोड़कर कोई भी दल सरकार बनाने का दावा नहीं कर रहा है। लेकिन एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने शिवसेना को झटका दे दिया है। क्योंकि एनसीपी और कांग्रेस में सरकार को लेकर कोई सहमति नहीं बनी है। जबकि शिवसेना दावा कर रही है कि वह अगले महीने तक राज्य में सरकार बनाएगी।
सोमवार को ही एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने सोनिया गांधी के साथ मुलाकात की। लेकिन इस मुलाकात में कोई सार्थक परिणाम नहीं निकला। वहीं इसके बाद सरकार पर सस्पेंस बढ़ता ही गया है। क्योंकि पवार ने साफ कर दिया था कि सरकार बनाने को लेकर सोनिया गांधी से मुलाकात पर कोई चर्चा नहीं हुई बल्कि महाराष्ट्र के सिसायी मुद्दों पर चर्चा हुई थी। जबकि शिवसेना ये मान कर चल रही थी कि सोनिया गांधी ने इस पर अपनी मुहर लगा दी है। फिलहाल शिवसेना राज्य में खाली हाथ है। क्योंकि उसके पास न तो कांग्रेस और न ही एनसीपी के समर्थन की चिट्ठी है।
क्योंकि कांग्रेस के खेमें ये ये बात भी निकल कर आ रही हैं कि सोनिया गांधी शिवसेना के साथ सरकार बनाने को लेकर ज्यादा उत्साहित नहीं है। क्योंकि इससे कांग्रेस का वोट बैंक प्रभावित होगा। कांग्रेस के रणनीतिकारों ने सोनिया गांधी को समझाया है कि अगर कोई गठबंधन होता है तो इससे कांग्रेस को महाराष्ट्र के साथ ही अन्य राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में अल्पसंख्यक वोट बैंक की नाराजगी झेलनी पड़ेगी। वहीं कई मुस्लिम संगठन ने कांग्रेस से शिवसेना से गठबंधन न करने के लिए सोनिया गांधी को पत्र भी लिखा है।
आज महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर कांग्रेस और एनसीपी के वरिष्ठ नेताओं की बैठक शाम पांच बजे होगी। माना जा रहा है कि ये बैठक शरद पवार के घर पर हो सकती है। इस बैठक में कांग्रेस अहमद पटेल, मल्लिकार्जुन खरगे, सुशील कुमार शिंदे, अशोक चव्हाण और पृथ्वीराज चौहान, बालासाहब थोरात, विजय वडट्टीवार रहेंगे तो एनसीपी से शरद पवार, प्रफुल्ल पटेल, अजित पवार और जयंत पाटिल, नवाब मलिक मौजूद रहेंगे।
फिलहाल शिवसेना भी अभी तक कुछ भी स्पष्टतौर से नहीं बोल रही है। उसकी सबसे ज्यादा उम्मीद एनसीपी को लेकर है। जो कांग्रेस को मना रही है। लेकिन कांग्रेस अपनी अंदरूनी राजनीती के कारण कोई फैसला नहीं ले पा रही है। क्योंकि कांग्रेस के ज्यादातर नेता इस बात के पक्ष में हैं कि राज्य में कांग्रेस को शिवसेना और एनसीपी के गठबंधन में शामिल होना चाहिए। जबकि सोनिया गांधी और उनके रणनीतिकारों को लग रहा है कि ये फैसला पार्टी के खिलाफ जा सकता है।
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