न जमीन न जनाधार, पीके को ले डूबी बड़ा नेता बनने की हसरत!

Published : Jan 30, 2020, 08:09 AM ISTUpdated : Jan 30, 2020, 12:20 PM IST
न जमीन न जनाधार, पीके को ले डूबी बड़ा नेता बनने की हसरत!

सार

आखिरकार नीतीश कुमार पार्टी उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर और पवन वर्मा को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। ये दोनों पहले नेता हैं जिन्होंने नागरिकता कानून को लेकर नीतीश कुमार के फैसले पर सवाल उठाने शुरू किए थे। दोनों नेता पार्टी में ही  रहकर नीतीश कुमार पर विपक्षी दलों की तरह हमले कर रहे थे। जबकि नीतीश कुमार चुप थे। नीतीश कुमार को कभी प्रशांत किशोर का करीबी माना जाता है।

नई दिल्ली। कभी बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल यूनाइटेड के मुखिया नीतीश कुमार के सबसे करीबी नेताओं में शुमार चुनावी रणनीतिकार आखिरकार पार्टी से बाहर हो गए हैं। पीके के लिए पार्टी से जाना बड़ी बात नहीं है। लेकिन जिस तरह से उन्हें पार्टी से निकाला और वह भी नीतीश कुमार से नजदीकियां होने के बाद। वह जरूर शर्मनाक करता है। जानकारों का मानना है कि पीके जदयू में ही नहीं बल्कि देश की राजनीति में एक बड़ा नेता बनने का सपना देख रहे थे। इसके जरिए वह कई अन्य दलों में भी अपनी पैठ बनाना चाहते थे। लेकिन इतना नहीं समझ पाए जिस पार्टी ने उन्हें इतना बड़ा पद दिया है। वहां उनके विरोधी भी बहुत हैं। लिहाजा उनकी हसरतों को भांप कर उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया है।

आखिरकार नीतीश कुमार पार्टी उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर और पवन वर्मा को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। ये दोनों पहले नेता हैं जिन्होंने नागरिकता कानून को लेकर नीतीश कुमार के फैसले पर सवाल उठाने शुरू किए थे। दोनों नेता पार्टी में ही  रहकर नीतीश कुमार पर विपक्षी दलों की तरह हमले कर रहे थे। जबकि नीतीश कुमार चुप थे। नीतीश कुमार को कभी प्रशांत किशोर का करीबी माना जाता है। लेकिन प्रशांत किशोर नहीं समझ सके कि राजनीति में एक हद तक बर्दाश्त किया जाता है।

लिहाजा जब पानी सिर के ऊपर से निकलना शुरू हुआ तो नीतीश कुमार ने पीके को उन्हें बाहर किर दिया है। पीके कभी पार्टी में नीतीश कुमार के उत्तराधिकारी माने जाते थे। लेकिन नीतीश के विरोध ने उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया। पहचान सफल चुनावी रणनीतिकार की थी। 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के चुनावी कैंपेन को धार देने के बाद उन्होंने कई पार्टियों के लिए काम किया। यूपी विधानसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के प्रचार की जिम्मेदारी ली। अक्टूबर 2018 में वह जेडीयू में शामिल हुए और उन्हें सीधे पार्टी का उपाध्यक्ष बना दिया गया।

सीधे इतना बड़ा पद दिए जाने के बाद से ही प्रशांत किशोर पार्टी के उन नेताओं को खटक रहे थे, जो पहले नीतीश के काफी करीबी हुआ करते थे। हालांकि, तब नीतीश ने प्रशांत के खिलाफ उठने वाली आवाजों को शांत कर दिया, लेकिन पार्टी सूत्र बताते हैं कि पीके की स्वीकार्यता नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच कभी नहीं रही, सभी नीतीश की वजह से ही चुप रहे। शुरुआत में पीके को नीतीश के उत्तराधिकारी के रूप में भी देखा जा रहा था। लेकिन एकाएक नीतीश कुमार और पीके के बीच दूरियां बननी शुरू हो गई। लिहाजा पीके को पार्टी से रूखसत कर दिया गया।

कांग्रेस की तारीफ की थी

प्रशांत किशोर सीएए के मुद्दे पर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की तारीफ की थी। हालांकि पीके ने कांग्रेस को सलाह भी दी थी। लेकिन कांग्रेस ने पीके की सलाह को दरकिनार कर दिया था। यही नहीं पीके के बयानों के कारण कांग्रेस और राजद को नीतीश कुमार के खिलाफ राज्य में माहौल बनाने का मौका मिला। जिसको लेकर नीतीश कुमार खासे नाराज हो गए।

नीतीश की करीबियां का उठा रहे थे फायदा

प्रशांत किशोर जदयू के उपाध्यक्ष होने के साथ ही चुनावी रणनीतिकार हैं। लिहाजा नीतीश के करीबियों का मानना है वह नीतीश से रिश्तों का फायदा अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए कर रहे हैं। पीके पहले भाजपा और उसके बाद जदयू के रणनीतिकार रह चुके हैं। उसके बाद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस, फिरआंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी की पार्टी के लिए चुनावी कैंपेन कर चुके हैं। इसके बाद उन्होंने पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के लिए चुनावी कैंपेन का काम संभाला। पार्टी के नेताओं का मानना था कि पीके को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया तो गया, लेकिन वह जनता के नेता नहीं थे।

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