
जीवनदायिनी गंगा। कहा जाता है कि गंगा के एक आचमन भर से ही मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। लेकिन अब गंगा को लेकर उत्तराखंड में राजनीतिक बिसात बिछने लगी है। सूबे में निकाय चुनाव से पहले गंगा को अविरल बनाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार से लड़ रहे 'गंगापुत्र' कहलाने वाले डा. जीडी अग्रवाल यानी स्वामी सानंद की मौत के बाद दोनों राष्ट्रीय दल इसे लेकर एक-दूसरे पर हमलावर हो गए हैं। कांग्रेस मान रही है कि नगर निकाय चुनाव और लोकसभा चुनाव से पहले उसे एक बड़ा मुद्दा मिल गया है। वहीं भाजपा कांग्रेस पर गंगापुत्र की मौत पर ओझी राजनीति करने का आरोप लगा रही है।
ऐसा नहीं है कि स्वामी सानंद पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने गंगा के लिए अपने प्राण त्यागे। उनसे पहले भी गंगा को लेकर आंदोलन और अनशन करने वालों की जान गई है। गंगा के लिए तीन संत अपने प्राण दे चुके हैं। खास बात यह है कि गंगा नदी के लिए बलिदान देने वाले तीनों संत संस्था मातृसदन से जुड़े थे।
कांग्रेस स्वामी सानंद के गंगा आंदोलन का समर्थन अपने राजनैतिक फायदे के लिए पहले से ही कर रही थी। इसके जरिए कांग्रेस सीधे तौर पर भाजपा को अविरल गंगा और उसकी सफाई के मुद्दे पर घेर रही थी, क्योंकि जिस वोट बैंक के जरिये सूबे में भाजपा सत्ता में आई, वह गंगा और धर्म से जुड़े मुद्दों पर भाजपा की तरफ झुकाव रखता है। लिहाजा अब कांग्रेस को स्वामी सानंद की मौत के बाद एक ऐसा मुद्दा मिल गया है, जिसे भाजपा के खिलाफ हरिद्वार समेत पहाड़ी इलाकों में राजनैतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। कांग्रेस के प्रवक्ता मथुरा दत्त जोशी कहते हैं कि स्वामी सानंद की मौत लिए पूरी तरह से भाजपा की राज्य सरकार जिम्मेदार है। स्वामी सानंद 111 दिन से अनशन में थे, भाजपा के कई मंत्री हरिद्वार आते हैं लेकिन क्या किसी ने उनसे मिलने की कोशिश की। उनकी बात तक नहीं सुनी गई।
हालांकि स्वामी सानंद के आमरण अनशन की जानकारी केंद्र को थी, उसे लग रहा था कि राज्य की भाजपा सरकार उन्हें मना लेगी। क्योंकि अविरल गंगा के लिए जिस एक्ट को बनाने की मांग स्वामी सानंद कर रहे थे। उसे हाल फिलहाल पूरा नहीं किया जा सकता था। लिहाजा दो केंद्रीय मंत्री भी उनके संपर्क में थे। केंद्रीय मंत्री उमा भारती उनसे दो बार मिल चुकी थी और केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी भी उनके संपर्क में थे। दो दिन पहले हरिद्वार के स्थानीय सासंद निशंक भी उनसे मिले थे। लेकिन इसके बावजूद भाजपा स्वामी सानंद को मना नहीं पाई।
स्वामी निगमानंद सरस्वती की मौत भी गंगा से जुड़े मुद्दे पर ही हुई थी। उस वक्त भी राज्य में भाजपा की सरकार थी और हरिद्वार से भाजपा के मौजूदा सांसद रमेश चंद्र पोखरियाल निशंक मुख्यमंत्री थे। जबकि केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। लिहाजा राज्य सरकार ने इस मामले के लिए पूरी तरह से केंद्र को जिम्मेदार बताया था। यही नहीं 2014 के आम चुनावों में नरेंद्र मोदी ने गंगा की अविरलता व स्वच्छता को बड़ा संकल्प बताया था।
वर्ष 2013 में स्वामी गोकुलानंद एकांत तपस्या करने गए थे। मातृसदन के मुताबिक, नैनीताल के बामनी गांव में उन्हें जहर दे दिया गया। उनकी विसरा रिपोर्ट में एस्कोलिन जहर की पुष्टि हुई। गंगा में खनन को लेकर आंदोलन करने वाले स्वामी गोकुलानंद की हत्या तब की गई, जब राज्य और केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। उनकी हत्या का आरोप खनन माफिया पर लगा, जिसे भाजपा ने बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था।
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