
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में होने वाले नगर निगम चुनाव से पहले भाजपा में नागरिकता कानून को लेकर दो फाड़ हो गए हैं। एक धड़े का मानना है कि पार्टी को इस विवादास्पद मुद्दे को छोड़ देना चाहिए और स्थानीय मुद्दों पर ही ध्यान देना चाहिए वहीं दूसरे धड़े का कहना है कि राज्य की स्थिति को देखते हुए नागरिकता कानून और एनआरसी राज्य में बड़े मुद्दे हैं।
हालांकि भाजपा का साफ मानना है कि सीएए को लेकर दिल्ली में पार्टी को हार का सामना नहीं करना पड़ा। क्योंकि पार्टी का वोट प्रतिशत में इजाफा हुआ है और वहीं पार्टी के कई प्रत्याशी बहुत कम मार्जिन से हारे हैं। लिहाजा ये कहना लगत होगा कि पार्टी को नागरिकता कानून के कारण हार मिली है। लिहाजा अब पार्टी का पूरा फोकस पश्चिम बंगाल में होने वाले नगर निगम चुनावों में है।
लेकिन राज्य में पार्टी के एक गुट का मानना है कि राज्य में पार्टी को नागरिकता के मुद्दे को किनारे रखना चाहिए। क्योंकि इससे पार्टी को राज्य में नुकसान हो सकता है। जबकि दूसरे धड़े का कहना है कि राज्य की स्थिति को देखते हुए इन दोनों कानूनों से राज्य में भाजपा को फायदा हो सकता है। हालांकि राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। लेकिन उससे पहले राज्य में नगर निगम के चुनाव होने हैं। जिन्हें राज्य में विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है।
इसके लिए नेताओं के तर्क हैं कि लोकसभा चुनाव में भाजपा ने राज्य में 42 लोकसभा सीटों में से 18 सीटों पर जीत दर्ज की थी। जिसके बाद वह राज्य में टीएमसी की मुख्य प्रतिद्वंदी बन गई है। वहीं दिल्ली में भी भाजपा ने सात सीटों पर जीत दर्ज की थी और 56 फीसदी वोट हासिल किए थे। लेकिन विधानसभा चुनाव में उसे हार का सामना करना पड़ा है।
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