
मध्य प्रदेश. भोपाल की अंकिता श्रीवास्तव ने महज़ 18 साल की उम्र में अपने लीवर का 74% हिस्सा अपनी मां को दे दिया।अंकिता की मां को लिवर सिरोसिस था जिसका एक ही इलाज था लिवर ट्रांसप्लांट।अंकिता उस वक्त सिर्फ 13 साल की थी जब उनको अपनी मां की इस बीमारी के बारे में पता चला। माय नेशन हिंदी से अंकिता ने अपने विचार साझा किये ।
ट्रांसप्लांट के लिए 7 साल तक करना पड़ा इंतज़ार
अंकिता कहती हैं मैं उस दिन खुश थी जिस दिन मुझे पता चला कि मेरा ब्लड मां से मैच हो गया है, इससे ज्यादा खुशी की बात क्या हो सकती है की एक बेटी को जन्म देने वाली मां के लिए मैं अपना एक अंग दे सकूं, लेकिन ट्रांसप्लांट के लिए मुझे 7 साल का इंतजार करना पड़ा क्योंकि मैं उसे वक्त सिर्फ 13 साल की थी। यह 7 साल बहुत मुश्किल थे। मां की तबीयत इतनी खराब थी मैं उन्हें अस्पताल ले जाया करती थी। हालांकि इन 7 सालों में कई डोनर तलाश किए गए कि शायद कोई मिल जाए लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
ट्रांसप्लांट के लिए बढ़ाया 16 किलो वज़न
मां का इलाज दिल्ली के अपोलो हॉस्पिटल में चल रहा था, ऑपरेशन भी वहीं होना था। धीरे-धीरे मैंने लिवर ट्रांसप्लांट के बारे में जानकारी लेना शुरू किया। मेरा वेट 50 किलो था मानक की दृष्टि से मैं अंडरवेट थी और मुझे 16 किलो वजन बढ़ाना था। मैंने अपना वेट बढ़ाना शुरू किया और फिर वह वक्त आ चुका था जब मुझे अपनी मां को लिवर डोनेट करना था लेकिन फिर एक मुश्किल आ गयी। जब ट्रांसप्लांट का वक्त आया तो मां कोमा में चली गई मुझे और इंतजार करना पड़ा। खैर वो वक्त आ गया था. 26 फरवरी 2014 मैं यह तारीख भूल नहीं सकती मैं बहुत एक्साइटेड थी और पूरे जोश के साथ ऑपरेशन थेयटर में गयी। फाइनली मैंने 74 परसेंट लीवर मां को डोनेट कर दिया।ऑपरेशन के बाद जब मुझे होश आया तो मैं चारों तरफ छोटे-छोटे मॉर्फीन के तारों से लिपटी हुई थी। जरा सा भी सेंस में आती तो दर्द से कराहने लगती। तीन चौथाई लीवर का हिस्सा निकल जाने से हिलने में भी तकलीफ हो रही थी, मैं व्हील चेयर पर थी। एक महीने तक मैं अस्पताल में थी जहां पर मुझे उठने बैठने चलने का तरीका सिखाया जा रहा था। करवट लेती थी तो लिवर भी अपनी जगह से फिसलता था।
और मां की मौत हो गयी
4 महीने बाद मल्टी ऑर्गन फेलियर होने के कारण मां हमें छोड़ कर चली गई। उनके बिना रहना तो शायद हमने सपने में भी ना सोचा था। अभी हम इस गम से बाहर भी नहीं आए थे कि मेरे पिता ने दूसरी शादी कर ली, और मुझसे और मेरी बहन से अलग हो गए। हम दोनों बहने दादी के पास रहने लगे। मैं बड़ी थी इसलिए मुझ पर खर्च उठाने की जिम्मेदारी आ गई थी अब मुझे नौकरी करनी थी। लेकिन अभी मैं ठीक नहीं हुई थी। एक साल तक मुझे खड़ा होने या बैठने के लिए किसी ना किसी का सहारा लेना पड़ता था। पिछले 10 सालों से मैंने खुलकर कुछ भी खाया नहीं है। मेरी डाइट पर बहुत पाबंदी है, क्योंकि मेरे लीवर का साइज छोटा हो गया है इसलिए शरीर बहुत जल्दी गर्म हो जाता है। कहीं भी जाने के लिए मुझे पहले उस शहर का टेंपरेचर पता करना होता है। मैंने 10 साल से बर्गर पिज़्ज़ा छुआ नहीं है। ट्रैवलिंग के दौरान मुझे घर का खाना अपने साथ रखना होता है क्योंकि मुझे बाहर का खाना अलाउड नहीं है।
शुरू किया स्पोर्ट्स की ट्रेनिंग
ठीक होने में मुझे डेढ़ साल लगे फिर मैंने नौकरी ज्वाइन किया और इसके साथ साथ स्पोर्ट्स की ट्रेनिंग लेना शुरू कर दिया था। अंकिता कहती है मैंने स्टेट लेवल पर रनिंग और स्विमिंग जैसे कई गेम खेलें। मैं दुबारा खेल की तरफ लौटना चाहती थी। रिकवरी के दौरान मुझे ट्रांसप्लांट गेम्स के बारे में पता चला। यह सुनकर मैं खुश हो गई साल 2017 से मैंने तैयारी शुरू कर दिया और 18 में मेरा सिलेक्शन हो गया। 2019 में ब्रिटेन में हुए वर्ल्ड ट्रांसप्लांट गेम्स में मैंने थ्रो बॉल और लंबी कूद में गोल्ड मेडल जीता और विश्व रिकॉर्ड बनाया।
कामयाब एंटरप्रेन्योर बन चुकी हैं अंकिता
अंकिता की अपनी एडवरटाइजिंग फर्म है। पिछले 7 वर्षों में उन्होंने 8 ब्रांड (प्रीस्कूल एनिमेशन कैरेक्टर) खड़े किए हैं जिसमे पर्पल टर्टल शामिल है जो 25 देशों में उपलब्ध है और MENA में डिस्कवरी किड्स पर 350 किताबें और एक टीवी शो है। डिस्कवरी किड्स पर एक टीवी शो में अंकिता ने अभिनय किया है। इसके अलावा अंकिता वहार्टन के अपने दो सहपाठियों के साथ हेल्थ और फिटनेस स्टार्टअप पर काम कर रही हैं ।
21 अप्रैल 2023 को अंकिता ने ऑस्ट्रेलिया के पर्थ में आयोजित वर्ल्ड ट्रांसप्लांट गेम्स में लॉन्ग जंप में गोल्ड और रेस वर्क और शॉटपुट में सिल्वर मेडल हासिल किया। इस उपलब्धि को हासिल करने वाली वह देश की पहली एथलीट हैं।
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