
लखनऊ। यूपी की राजधानी लखनऊ के रहने वाले आरोह श्रीवास्तव इंग्लैंड में मर्चेंट नेवी की नौकरी करते थे। जहाज पर काम के दौरान एक बार-एक दिन उनके लिए 26 घंटे का हो गया। यह देखकर वह अचंभित हो गए। फिर टाइम कैलकुलेशन मेथड (समय कालगणना) पर रिसर्च शुरु कर दिया। दुनिया की पहली वैदिक डिजिटल घड़ी बनाने में सफल हुए, जो वेदों के आधार पर समय बताती है। चाहे वह सूर्योदय-सूर्यास्त हो या 24 घंटे में गुजरने वाले मुहुर्तों का समय। मध्य प्रदेश सरकार ने उज्जैन में उनकी बनाई वैदिक डिजिटल घड़ी स्थापित की है। आरोह श्रीवास्तव ने माय नेशन हिंदी से वैदिक डिजिटल घड़ी बनाने की अपनी जर्नी शेयर की है।
शून्य रेखा इंग्लैंड में ही क्यों?
आरोह श्रीवास्तव की शुरुआती पढ़ाई यूपी की राजधानी लखनऊ के गुरुकुल एकेडमी से हुई। मैकेनिकल इंजीनियरिंग में दाखिला लिया। दुनिया देखने का इतना मन था कि इंग्लैंड के एक कॉलेज से मर्चेंट नेवी की पढ़ाई शुरु कर दी। उसी दरम्यान ग्रीन विच म्यूजियम में घूमने गए तो पता चला कि प्राइम मेरेडियन (शून्य रेखा, प्रधान मध्याह्न रेखा या ग्रीनविच रेखा, दुनिया का मानक समय इसी रेखा से निर्धारित किया जाता है।) पृथ्वी पर कहीं भी हो सकता था। चूंकि समय का रिसर्च इंग्लैंड के ग्रीन विच पर हुआ। इसलिए उसे प्राइम मेरेडियन घोषित किया गया।
19वीं शताब्दी में उज्जैन था भारतीय कालगणना का केंद्र
आरोह कहते हैं कि जब यह पता चला कि यह इंसानों द्वारा बनाई गई शून्य रेखा है तो यह जानने की उत्सुकता हुई कि वास्तविक प्राइम मेरेडियन रेखा कहां है? इस बारे में स्टडी से पता चला कि 19वीं शताब्दी में मध्य प्रदेश का उज्जैन भारत के लिए काल गणना का केंद्र था और वहीं पर भारत का प्राइम मेरेडियन हुआ करता था। साल 1884 में यह शिफ्ट होकर ग्रीन विच चला गया। तभी से वह इस विषय पर उत्सुकतावश स्टडी करने लगें।
मिस्र की प्राचीन सभ्यता से आई मैकेनिकल घड़ी
आरोह कहते हैं कि जहाज पर नौकरी के दौरान अलग-अलग टाइम जोन में ट्रैवेल करना होता था। एक बार इंग्लैंड से नीदरलैंड की यात्रा में एक दिन 24 घंटे के बजाए 26 घंटे का हो गया। तब ख्याल आया कि दिन में 24 घंटे ही क्यों? किस आधार पर ऐसा हुआ? स्टडी से पता चला कि मिस्र की प्राचीन सभ्यता में 24 घंटे का जिक्र है। उसी आधार पर फ्रांस ने पहली मैकेनिकल घड़ी बनाई। ईस्ट इंडिया कंपनी ने उसे स्वीकारा और फिर पूरी दुनिया में फैला। उस समय के हिसाब से वह साइंटिफिक भी था, क्योंकि उसके पहले छाया और रेत घड़ी यूज हो रही थी।
आम घड़ी से क्यों अलग है वैदिक डिजिटल घड़ी
मतलब टाइम कैलकुलेशन का मैकेनिकल मेथड एक सभ्यता से आया। यह समझने के बाद आरोह ने अन्य सभ्यताओं की स्टडी की। तब भारतीय कालगणना के प्राचीन सिद्धांत के बारे में पता चला। जिसमें सूर्य और नक्षत्रों की गणना से मुहुर्त निकाले जाते थे। वह कहते हैं कि मुहुर्त समय का ही एक टर्म है यानी उसका संस्कृत रूपांतरण। भारतीय कालगणना का समय सूर्य के आधार पर 30 घंटे 30 मिनट और 30 सेकेंड में विभाजित है। जिसको मुहूर्त, काल और काष्ठा कहते हैं।
वैदिक घड़ी में क्या है विशेष?
आरोह कहते हैं कि सबसे पहले टाइम-फार्मेट (समय-प्रारूप) का उल्लेख ऋग्वेद में किया गया था। तब समय की गणना एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय तक होती थी। इस समय अंतराल के बीच 30 घंटे (मुहूर्त), 30 मिनट (काल) और 30 सेकंड (काष्ठ) होते हैं, जबकि मैकेनिकल घड़ी 24 बराबर हिस्सों में बंटी है। उस पर पृथ्वी के घूमने का ज्यादा असर नहीं पड़ता। यह स्टैंडर्ड टाइम फार्मेट हर दिन समान काम करता है। इसीलिए मौजूदा टाइम फार्मेट में सूर्योदय का समय डेली बदलता है, जबकि वैदिक घड़ी सूर्योदय के समय हमेशा शून्य बताती है। मैकेनिकल घड़ी में रात 12 बजे डेट बदल जाती है, जबकि वैदिक टाइम सूर्योदय से शुरू होता है और अगले सूर्योदय के समय तिथि बदलती है।
भारतीय कालगणना को टेक्नोलॉजी से जोड़ा
यह समझने के बाद उन्होंने सोचा कि यदि भारतीय कालगणना को टेक्नोलॉजी से जोड़ दिया जाए तो यह आम लोगों के लिए सुलभ हो जाएगा और वह अपनी दिनचर्या वेदों में बताए गए मुहुर्तों के अनुसार पूरी कर सकेंगे। साल 2017 में मर्चेंट नेवी की नौकरी छोड़ने के बाद वैदिक डिजिटल घड़ी बनाने का काम शुरु किया। अपनी जीविका चलाने के लिए अन्य काम भी करते रहें। साल 2020 तक दर्जनों बार किए गए प्रयास में असफल हुएं तो सब काम छोड़कर वैदिक घड़ी का सक्सेसफुल फॉर्मला बनाने में जुट गए और सफल भी हुए। अब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने इनोवेशन से आम लोगों को परिचित कराने की थी और भारतीय कालगणना के जानकारों (एस्ट्रोलॉजर, आध्यात्मिक गुरु) से कुछ सीखने की इच्छा भी। इसी मकसद से उन्होंने साल 2020 में 12 ज्योतिर्लिंगों और चारो धाम की साइकिल यात्रा शुरु कर दी।
उज्जैन में लगी है पहली वैदिक डिजिटल क्लॉक
देश के एक कोने से दूसरे कोने तक सफर के दौरान आरोह को भारतीय काल गणना के बारे में बहुत कुछ सीखने को मिला। एस्ट्रोलॉजर, गुरुओं और समाज के लोगों से इस बारे में चर्चा की। सनातन धर्म में जिस विधि से किसी काम की शुरुआत के लिए मुहुर्त तय करने का काम किया जाता है। उन्होंने उसी विधि या पद्धति या सिद्धांत को टेक्नोलॉजी से जोड़कर बनाई गई वैदिक डिजिटल घड़ी के बारे में बताया तो लोगों को पसंद आया। उनका भी उत्साह बढ़ा। भारतीय कालगणना के जानकारों ने उनके इनोवेशन को वेरिफाई भी किया। अब, आरोह की बनाई घड़ी उज्जैन में लगी है।
एप्लीकेशन भी कर रहे लॉन्च
आरोह श्रीवास्तव कहते हैं कि वैदिक डिजिटल घड़ी में दो सूर्योदय के बीच का समय 30 भागों में विभाजित है। सूर्योदय के समय घड़ी में समय शून्य हो जाता है। लोग भ्रमित न हो। इसलिए घड़ी में स्टैंडर्ड टाइम भी दिखता है। आने वाले 9 अप्रैल को डिजिटल क्लॉक का एप्लीकेशन लॉन्च कर रहे हैं, जिसे डाउनलोड कर मोबाइल पर वेदों के अनुसार समय देख सकते हैं। यह बिल्कुल फ्री है। आने वाले समय में ऐसी टेबल और दीवार घड़ी भी बनाने की तैयारी है। उनकी घड़ी की खासियत यह है कि इसे कहीं भी लेकर जाएं। वह हमेशा स्थानीय समय के अनुसार ही मुहुर्त बताएगा।
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