गो-प्रेमी मुकेश दीक्षित की कहानी: 3-3 दिन तक खुद भूखा रहे लेकिन खत्म नहीं होने दिया गायों का चारा

Rajkumar Upadhyaya |  
Published : Oct 20, 2023, 10:22 PM ISTUpdated : Oct 21, 2023, 04:26 PM IST
गो-प्रेमी मुकेश दीक्षित की कहानी: 3-3 दिन तक खुद भूखा रहे लेकिन खत्म नहीं होने दिया गायों का चारा

सार

3-3 दिन तक कुछ नहीं खाया पर गायों को भूखा नहीं रहने दिया। पूरा जीवन गो-सेवा को समर्पित कर दिया। शादी तक नहीं की। गोशाला में 198 पशु हैं। पशुओं के लिए टीन शेड, चारे का प्रबंध है। बेसहारा और बीमार गायों का पालन-पोषण करना मुकेश दीक्षित के लिए आसान नहीं था। आइए जानते हैं मुकेश दीक्षित और उनके परिवार के संघर्ष की कहानी। 

देवरिया। यूपी के देवरिया के रहने वाले मुकेश दीक्षित अनाथ गो सेवा आश्रम चलाते हैं। साल 1994 में उनके पिता व बड़े भाई अतीश दीक्षित ने यह गोशाला मात्र 7 पशुओं के साथ शुरु की थी। माई नेशन हिंदी से बात करते हुए मुकेश दीक्षित कहते हैं कि साल 2015 में गोशाला की कमान संभाली। समय इतना खराब था कि 3-3 दिन तक कुछ नहीं खाया पर गायों को भूखा नहीं रहने दिया। पूरा जीवन गो-सेवा को समर्पित कर दिया। शादी तक नहीं की। मौजूदा समय में गोशाला में 198 पशु हैं। खुले आसमान में रहने वाले पशुओं के लिए टीन शेड, चारा आदि का प्रबंध है। लावारिस गायों के पालन-पोषण का काम मुकेश के लिए आसान नहीं था। उन्हें काफी मुसीबतों का सामना करना पड़ा। आइए डिटेल में जानते हैं उनका स्ट्रगल। 

सांप के डसने से भतीजे की हो चुकी है मौत

देवरिया के भटनी बाजार से करीबन 2 किलोमीटर दूर थाना परिसर के पास अनाथ गो सेवा आश्रम स्थित है। मुकेश पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि पहले गायें चारे की तलाश में किसी के खेत में चली जाती थी तो मारपीट की नौबत तक आ जाती थी। उसको लेकर केस भी झेला। गायों की देखभाल के दौरान एक भतीजे की सांप के डसने की वजह से मौत भी हो चुकी है। तब गोशाला में चारा और टीन शेड तक नहीं था। ठंडी के समय में हम लोग गायों के बीच या पुआल में सोते थे। गायें भी खुले आसमान के नीचे रहती थी। 2015 में गोशाला की स्थिति बदलने का निर्णय लिया। 

 

बीमार गायें ठीक होने के बाद देने लगीं दूध, बिक्री से आमदनी भी

मुकेश कहते हैं कि साल 2015 के बाद शुरुआती 3 साल कड़ा स्ट्रगल रहा। उन्होंने फेसबुक पेज और व्हाट्सएप ग्रुप बनाया। ग्रुप के जरिए लोगों का सहयोग मिलना शुरु हुआ। उन्होंने गोशाला को स्वावलम्बी बनाने के लिए भी काम करना शुरु किया। लावारिस देसी गायों में से कुछ दूध भी देती हैं। उनकी बिक्री भी करते हैं और उसकी आमदनी से भी गोशाला के संचालन में मदद मिलती है। कुछ साल पहले गोशाला में टीन शेड का निर्माण हुआ। अब गोशाला में चारे का भी प्रबंध है। स्थानीय लोग भी अपना सहयोग देते हैं।

यहां गोमूत्र की है काफी डिमाण्ड 

ग्रामीण इलाके में मौजूद अनाथ गो सेवा आश्रम में देसी गायों की संख्या ज्यादा है। ज्यादातर गायें बीमार या लावारिस स्थिति में गोशाला लाई गई थीं। उन्हीं में से कुछ गाय इलाज के बाद स्वस्थ हो गईं और दूध देने लगीं। वर्तमान में गोमूत्र की डिमांड भी बढ़ी है। तमाम लोग गोशाला से गोमूत्र लेकर जाते हैं और उसके बदले गोशाला को सहयोग करते हैं।

 

बेसहारा और घायल पशुओं को लाते हैं गोशाला 

ऐसा नहीं कि मुकेश दीक्षित सिर्फ गोशाला में मौजूद पशुओं की ही सेवा करते हैं। यदि उन्हें रास्ते में बीमार या घायल पशु दिख जाता है तो पशुपालन विभाग को सूचना देते हैं और उसका इलाज कराने की कोशिश भी करते हैं। बेसहारा और घायल पशुओं को गोशाला में भी लाते हैं और उनका इलाज कराते हैं। इस काम के लिए उन्हें सम्मानित भी किया जा चुका है। राजस्थान के गवर्नर कलराज मिश्र समेत अन्य जनप्रतिनिधि उन्हें सार्वजनिक मंच से सम्मानित भी कर चुके हैं।

हर पशु का नामकरण

गोशाला के सभी पशुओं का नामकरण किया गया है। अनाथ गो सेवा आश्रम के कर्मचारी पशुओं को उनके नाम से ही बुलाते हैं। परिसर में गो और मानव के बीच प्रेम का अनोखा संवाद होता है। जिस पशु को उसके नाम से पुकारा जाता है तो पशु पुकारने वाले के पास दौड़े चले जाते हैं। पशु और मानव के बीच ऐसा संवाद कम ही देखने को मिलता है। 

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