रोबोट बनने से बचें-लाइफ में बैलेंस कैसे बनाएं? मां धर्म ज्योति से जानें ये बड़ी बात

Surya Prakash Tripathi |  
Published : Sep 15, 2024, 01:35 PM ISTUpdated : Sep 18, 2024, 11:46 AM IST
रोबोट बनने से बचें-लाइफ में बैलेंस कैसे बनाएं? मां धर्म ज्योति से जानें ये बड़ी बात

सार

मां धर्म ज्योति ओशो की शुरुआती शिष्याओं में से एक हैं। उन्होंने संन्यासी जीवन, ओशो की शिक्षाओं और अपने अनुभवों पर विशेष चर्चा की, जहां उन्होंने अपने सन्यास काल के दर्द भरे पल को शेयर करते हुए जागरूकता और प्रेम पर बल दिया।

मां धर्म ज्योति, ओशो के शुरुआती शिष्यों में से एक, को 1970 में संन्यास की दीक्षा दी गई थी। यह संन्यास उनके जीवन का वह मोड़ था जहां उन्होंने जागरूकता और प्रेम के सिद्धांतों को आत्मसात किया। उन्होंने ओशो के साथ मनाली में एक शिविर के दौरान संन्यास लिया, जहां ओशो ने उन्हें "मां धर्म ज्योति" नाम दिया। उन्होंने उस समय नारंगी वस्त्र पहना और माला धारण की, जो ओशो के शिष्यों की पहचान बन गई थी। मां धर्म ज्योति ने "दस हजार बुद्धों के लिए सौ कहानियां" नामक एक पुस्तक भी लिखी है और वह दिल्ली के ओशो धाम में ध्यान शिविरों का संचालन करती हैं।

मां धर्म ज्योति कब बनी ओशो की शिष्या?
1960 के दशक में मां धर्म ज्योति एक गुरु की तलाश में थीं, जो उनके धार्मिक और मनोवैज्ञानिक जिज्ञासाओं को शांत कर सके। 1968 में मुंबई में उन्होंने ओशो के प्रवचन का एक पोस्टर देखा। उसी क्षण वह उनसे मिलने के लिए प्रेरित हुईं। बॉम्बे के षणमुखानंद हॉल में हज़ारों लोगों की भीड़ में वह बैठी थीं और ओशो उर्फ आचार्य रजनीश की पहली आवाज़ सुनते ही उन्होंने अपनी आंखें बंद कर लीं। ओशो की आवाज़ ने उन्हें एक गहरे सन्नाटे में पहुंचा दिया और उनके सभी सवालों के जवाब मिल गए।

कहां से हुई मां धर्म ज्योति की सन्यास यात्रा की शुरूआत?
मां धर्म ज्योति का कहना है कि उनके दिल ने ओशो के शब्दों की सच्चाई को पहचान लिया और उसी पल उन्हें महसूस हुआ कि उन्हें वह गुरु मिल गया है जिसकी वह तलाश कर रही थीं। इसके बाद वह ओशो के साथ एक ध्यान शिविर में भाग लेने के लिए गुजरात के सूरत चली गईं, जहां से उनका संन्यासी जीवन शुरू हुआ।

बदनाम गुरू से सन्यास की दीक्षा लेना थी चुनौती 
मां धर्म ज्योति याद करती हैं कि संन्यास की दीक्षा उनके जीवन में अचानक और अप्रत्याशित रूप से आई थी। ओशो ने उन्हें एक बैठक में बुलाया और संन्यास आंदोलन की शुरुआत की घोषणा की। इस आंदोलन के तहत, संन्यासियों को अपने घरों में रहना था, नारंगी वस्त्र पहनने थे, और ध्यान के मार्ग पर चलना था। हालांकि, समाज में ओशो की बदनाम प्रतिष्ठा के कारण, यह यात्रा हमेशा सरल नहीं रही। उस समय ओशो को 'सेक्स गुरु' का लेबल दिया गया था और उनके शिष्यों को समाज से अलग नजरों से देखा जाता था।

नारंगी वस्त्र और माला देखकर पब्लिक प्लेस पर होता था हरेसमेंट
मां धर्म ज्योति कहती हैं कि उनके नारंगी वस्त्र और माला ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह ओशो की अनुयायी हैं, और इस कारण से उन्हें अक्सर पब्लिक पलेस पर हरेसमेंट को फेस करना पड़ा। वह एक घटना को याद करते हुए बताती हैं, कि एक बार जब वह बस स्टॉप पर खड़ी थीं। उसी दौरान एक बस गुजरी। बस के ऊपरी डेक से कुछ लड़के उन्हें फ्लाईंग किस भेजने लगे। यह एक अजीब और असहज स्थिति थी, लेकिन उन्होंने इसे खुद को परेशान नहीं करने दिया। वह कहती हैं कि ओशो ने उन्हें सिखाया था कि लोगों को बहुत गंभीरता से न लें और हर स्थिति में जागरूकता और प्रेम बनाए रखें।

ओशो ने मां धर्म ज्योति को उत्पीड़न से बचने का बताया ये अनोखा तरीका
जब उन्होंने ओशो को इस घटना के बारे में बताया तो ओशो ने हंसते हुए कहा कि तुम्हें उन्हें उड़ते हुए आशीर्वाद देना चाहिए था। इस शिक्षा ने मां धर्म ज्योति को लोगों की आलोचनाओं और उत्पीड़न से ऊपर उठने की शक्ति दी। ओशो की एक शिक्षा जिसे मां धर्म ज्योति अपने जीवन में गहराई से मानती हैं, वह है कि आप जो भी करें, उसे जागरूकता और प्रेम के साथ करें। रोबोट की तरह न बनें। अपने जीवन में संतुलन और समग्रता लाएं। यही संदेश मां धर्म ज्योति आज भी अपने जीवन में अपनाती हैं और इसे सभी के लिए प्रासंगिक मानती हैं।

 


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