बोफोर्स मामलाः सीबीआई की अपील खारिज, सुप्रीम कोर्ट ने कहा - 13 साल की देरी की वजह में दम नहीं

Published : Nov 02, 2018, 03:04 PM IST
बोफोर्स मामलाः सीबीआई की अपील खारिज, सुप्रीम  कोर्ट ने कहा - 13 साल की देरी की वजह में दम नहीं

सार

हाईकोर्ट ने 2005 में अपने फैसले में हिंदुजा बंधुओं-एस पी हिंदुजा, जी पी हिंदुजा और पी पी हिंदुजा तथा अन्य के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत सारे आरोप निरस्त कर दिए थे।

सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक रूप से संवेदनशील 64 करोड़ रुपये के बोफोर्स तोप सौदा दलाली कांड में हिंदुजा बंधुओं सहित सारे आरोपियों को आरोपमुक्त करने के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सीबीआई की अपील शुक्रवार को खारिज कर दी।    

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने अपील दायर करने में 13 साल की देरी को माफ करने का जांच ब्यूरो का अनुरोध अस्वीकार कर दिया। हाईकोर्ट ने 31 मई, 2005 को अपना फैसला सुनाया था। पीठ ने कहा कि वह अपील दायर करने में 4500 दिन से अधिक की देरी के बारे में जांच ब्यूरो द्वारा बताए गए कारणों से संतुष्ट नहीं है। जांच ब्यूरो ने इस साल दो फरवरी को अपील दायर की थी। हालांकि, शीर्ष अदालत ने कहा कि जांच ब्यूरो पहले से ही लंबित अधिवक्ता अजय अग्रवाल की अपील पर सुनवाई के दौरान ये सारे बिंदु उठा सकता है। अग्रवाल ने भी हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दे रखी है। शीर्ष अदालत पहले ही अजय अग्रवाल की अपील स्वीकार कर चुकी है। अजय अग्रवाल ने 2014 के लोकसभा चुनाव में रायबरेली निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा था।    

केंद्र की ओर से अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने शीर्ष अदालत से यह स्पष्ट करने का अनुरोध किया कि जांच ब्यूरो की अपील खारिज होना उसे इस मामले में आगे जांच करने से नहीं रोकता है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में इस मुद्दे का कोई जिक्र नहीं किया। हाईकोर्ट ने 2005 में अपने फैसले में हिंदुजा बंधुओं-एस पी हिंदुजा, जी पी हिंदुजा और पी पी हिंदुजा तथा अन्य के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत सारे आरोप निरस्त कर दिए थे।    लोकसभा चुनाव के बाद एनडीए के सत्ता में आने पर यह अटकलें लगाई जा रही थीं कि जांच ब्यूरो अब अग्रवाल की याचिका में प्रतिवादी के रूप में आएगी या फिर अलग से अपील दायर करेगी।    

लंबे विचार विमर्श के बाद जांच ब्यूरो को 2018 में शीर्ष अदालत में अपील दायर करने की एनडीए सरकार ने मंजूरी दी थी। हालांकि अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने जनवरी में हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ एक दशक से अधिक विलंब के बाद अपील दायर नहीं करने की सलाह दी थी। परंतु बाद में विधि अधिकारियों के बीच हुई मंत्रणा के बाद जांच ब्यूरो ने यह अपील दायर की।    

इस अपील में एजेंसी ने महत्वपूर्ण दस्तावेज और साक्ष्यों का भी सहारा लिया था। सूत्रों ने बताया कि अपील दायर करने के लिए अटार्नी जनरल से मंजूरी मिलने के बाद फरवरी में जांच एजेंसी हरकत में आई और उसने अपील में निजी जासूस माइकल हर्शमैन के अक्टूबर, 2017 के इंटरव्यू को आधार बनाया। इस इंटरव्यू में हर्शमैन ने आरोप लगाया था कि राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने इस मामले में उसकी जांच को प्रभावित किया था।    

हर्श अमेरिका स्थित निजी जासूसी फर्म फेयरफैक्स का प्रेजीडेंट है और उसने टेलीविजन इंटरव्यू में दावा किया था कि राजीव गांधी उस समय आग बबूला हो गए जब उसने स्विस बैंक में ‘मांट ब्लैंक’ खाते का पता लगा लिया था। बोफोर्स मामले में सीबीआई ने 22 जनवरी, 1990 को आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, और धोखे के आरोप में भारतीय दंड संहिता और भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत एबी बोफोर्स के तत्कालीन अध्यक्ष मार्टिन आर्दबो, कथित बिचौलिए विन चड्ढा और हिंदुजा बंधुओं के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी।    

इस मामले में पहला आरोप पत्र 22 अक्टूबर, 1999 को विन चड्ढा, ओतावियो क्वात्रोच्चि, तत्कालीन रक्षा सचिव एसके भटनागर, आर्दबो और बोफोर्स कंपनी के खिलाफ दायर किया गया था। बाद में पूरक आरोप पत्र नौ अक्टूबर, 2000 को हिंदुजा बंधुओं के खिलाफ दायर किया गया था। सीबीआई की विशेष अदालत ने चार मार्च, 2011 को क्वात्रोच्चि को यह कहते हुए आरोप मुक्त कर दिया था कि देश उसके प्रत्यर्पण पर गाढ़ी कमाई का खर्च वहन नहीं कर सकता जिस पर पहले ही 250 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। (एजेंसी इनपुट के साथ)

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