
लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में मुख्य लड़ाई भारतीय जनता पार्टी और एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन की मानी जा रही है। राज्य में 67 सीटों पर मतदान हो चुका है और महज 13 सीटों पर अंतिम चरण में मतदान होना है। हालांकि इस इस चुनावी लड़ाई में ज्यादातर सीटों में कांग्रेस नजर नहीं आ रही है। लेकिन यूपी जैसे अहम राज्य में कांग्रेस पार्टी का पूरा दारोमदार प्रियंका गांधी पर ही है। अगर ये कहें कि पूरे प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के बजाय प्रियंका चुनाव लड़ रही हैं तो गलत नहीं होगा। लिहाजा राजनीति में इंट्री के बाद इस चुनावी रण में असल परीक्षा प्रियंका गांधी की है।
कई सालों की अटकलों के बाद कांग्रेस पार्टी ने इस साल फरवरी में प्रियंका गांधी वाड्रा को कांग्रेस का महासचिव और पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी नियुक्त किया। हालांकि ये कोई चौंकाने वाला कदम नहीं था क्योंकि कांग्रेस के तरकश में यही एक तीर था, जिसके जरिए वह उत्तर प्रदेश में अपनी खोई हुई जमीन हासिल कर सकती थी। इसके बाद मार्च में प्रियंका गांधी ने पद संभाला और पार्टी ने उन्हें लखनऊ में रोड शो के जरिए सक्रिय राजनीति में इंट्री कराई। इसके बाद प्रियंका गांधी पूरी तरह से उत्तर प्रदेश में सक्रिय हो गयी।
यहां तक की उन्होंने उत्तर प्रदेश में टिकट बांटने में भी अहम भूमिका निभाई। प्रियंका गांधी की रणनीति के तहत अन्य दलों से नेताओं को भी पार्टी में आयातित किया गया। इसका असर ये हुआ कि जो भी नेता बीजेपी, एसपी और बीएसपी में नाराज चल रहे थे, वह कांग्रेस में आ गए और कांग्रेस ने उन्हें लोकसभा का टिकट दिया। प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाए जाने के बाद यूपी की जिम्मेदारी पूरी तरह से प्रियंका को सौंपी गयी। अब इसी क्षेत्र में प्रियंका गांधी की असल परीक्षा है।
खासतौर से पूर्वांचल में, जहां प्रियंका को इसका प्रभारी नियुक्त किया। अगर कांग्रेस पार्टी का प्रचार देखें तो केवल प्रियंका गांधी ही यहां पर स्टार प्रचारक है, बाकी नेता चुनावी मंचों पर महज शो पीस बनकर रह गए हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में रविवार को 14 सीटों पर चुनाव हो गया है और बाकी की 13 सीटों पर अंतिम सातवें चरण में मतदान 19 मई को होना है। फिलहाल प्रियंका की मांग पर पार्टी ने कृष्णा पटेल की अगुवाई वाले अपना दल और बाबू सिंह कुशवाहा की जन अधिकार पार्टी के साथ ही महान दल के साथ चुनावी गठबंधन किया।
लेकिन इन दलों का संगठन भी कांग्रेस की तरफ पूर्वांचल में ज्यादा मजबूत नहीं है। लेकिन किसी भी जीत-हार में ये दल अहम भूमिका निभा सकते हैं। लिहाजा किसी भी हार जीत का जिम्मा पूरी तरह से प्रियंका के खाते में ही जोड़ा जाएगा। राज्य में कांग्रेस के ज्यादातर नेता प्रचार से नदारद हैं, यहां तक कि पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी चुनावी रैलियों से दूरी बनाकर रखी है।
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