बिहार में दिमागी बुखार पर सक्रिय हुई केन्द्र सरकार: अब तक 4 दर्जन से ज्यादा बच्चों की मौत

Published : Jun 12, 2019, 06:01 PM ISTUpdated : Jun 12, 2019, 06:03 PM IST
बिहार में दिमागी बुखार पर सक्रिय हुई केन्द्र सरकार: अब तक 4 दर्जन से ज्यादा बच्चों की मौत

सार

बिहार के मुजफ्फरपुर में दिमागी बुखार के कहर से अब तक 50 से ज्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है। इस गंभीर मामले पर केन्द्र सरकार ने कार्यवाही शुरु की है। गुरुवार को केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्द्धन प्रभावित इलाकों का दौरा करेंगे। 

नई दिल्ली: बिहार के मुजफ्फरपुर में दिमागी बुखार से भारी तबाही फैली हुई है। 56 बच्चों की मौत के बाद अब केन्द्र सरकार ने मामला अपने हाथ में लेने का फैसला किया है। गुरुवार को केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्द्धन प्रभावित इलाकों का दौरा करने के लिए जा रहे हैं। उनके साथ राज्य मंत्री अश्विनी चौबे और स्वास्थ्य मंत्रालय में सचिव प्रीति सोरेन भी होंगी। 

दक्षिण बिहार के मुजफ्फरपुर में दिमागी बुखार (एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम) की वजह से अब तक 56 बच्चों की मौत हो चुकी है। मुजफ्फरपुर के श्री कृष्णा मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के अधीक्षक सुनील शाही ने जानकारी दी है कि 'जनवरी से 2 जून तक 13 रोगियों को भर्ती किया गया था, उनमें से 3 की मृत्यु हो गई। 2 जून से इस दिन तक 86 लोगों को भर्ती किया गया था, जिनमें से 31 की मौत हो गई। जिले के निजी और सरकारी अस्पतालों में अधिकांश वार्डों में बाल मरीज लगातार आ रहे हैं। इसमें से ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों से हैं।

बहुत से बच्चों की मौतें इस अस्पताल के बाहर भी हुई हैं। मुजफ्फरपुर पूरी दुनिया में अपनी लीची के लिए प्रसिद्ध है। पिछले दिनों विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार अधपकी लीची की वजह से यह बीमारी फैल रही है। लीची में पाया जाने वाला एक विशेष प्रकार का तत्व इस बुखार का कारण हो सकता है। हर साल कई बच्चे इंसेफलाइटिस की भेंट चढ़ जाते हैं।  
आम तौर पर देखा गया है कि मुजफ्फरपुर में लीची के उत्पादन के मौसम में ही दिमागी बुखार फैलता है। 

उत्तरी बिहार के चार जिले सीतामढ़ी, शिवहर, मोतिहारी और वैशाली में इस बीमारी का प्रकोप है। एसकेएमसीएच अस्पताल में पहुंचने वाले ज्यादातर पीड़ित बच्चे इन जिलों से ही हैं। 

अभी तक जितने बच्चों की मौत के आंकड़े सामने आए हैं। वह सरकारी या निजी अस्पताल में भर्ती बच्चों की है। अभी यह पता नहीं चल पाया है कि दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में कितने बच्चे इस बीमारी के शिकार हो चुके हैं। 

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