हाशिमपुरा नरसंहार में पीएसी के जवानों को उम्र कैद

Published : Oct 31, 2018, 03:09 PM IST
हाशिमपुरा नरसंहार में पीएसी के जवानों को उम्र कैद

सार

इन सभी को अदालत ने 2 मई 1987 को 42  युवकों की हत्या के मामले में हत्या, अपहरण,साक्ष्यों को मिटाने का दोषी मानते हुए सजा सुनाई गई है। इससे पहले तीसहजारी कोर्ट ने 2015 में इन सभी 16 जवानों को बरी कर दिया था।

नई दिल्ली-- मेरठ के हाशिमपुरा कांड में दिल्ली हाईकोर्ट ने यूपी पीएसी के 16 जवानों  को उम्रकैद की सजा सुनाई है। इन सभी को अदालत ने 2 मई 1987 को 42  युवकों की हत्या के मामले में हत्या, अपहरण,साक्ष्यों को मिटाने का दोषी मानते हुए सजा सुनाई गई है।

इससे पहले तीसहजारी कोर्ट ने 2015 में इन सभी 16 जवानों को बरी कर दिया था। जिसके खिलाफ मारे गए लोगों के परिजनों, यूपी सरकार और अन्य ने दिल्ली हाईकोर्ट में अपील की थी। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलट दिया। खास बात यह है कि उम्रकैद की सजा पाए 16 लोगों में से तीन की मौत हो चुकी है।

हाशिमपुरा का मामला  22 मई, 1987 का है जब रात में  पीएसी के जवानों ने 50 लोगों को गिरफ़्तार किया और पास ही एक पीपल के पेड़ के पास ले जाकर कतार में खड़ा कर दिया। उसमें से बच्चों और बूढ़ों को अलग कर उन्हें जाने दिया गया।

शेष 42  युवकों को पास ही गुलमर्ग सिनेमाहाल पर खड़े पीएसी के ट्रक में बैठाकर थाने ले जाने के लिए रवाना किया गया, लेकिन थाने के बजाय पीएसी के जवान उस ट्रक को प्लाटून कमांडर सुरिंदर पाल सिंह के नेतृत्व में दिल्ली-मेरठ हाइवे पर ले गए और वहां गंग नहर के किनारे एक आम के पेड़ के नीचे सभी को उतारा और फिर कतार में खड़ा करके उन्हें गोली मार दी गई और उनकी लाशें नहर में बहा दी गईं।

कुछ युवकों ने शोर मचाया और ट्रक से नहीं उतरे। उन्हें फिर माकनपुर गांव के नज़दीक हिंडन नहर के पास उतार कर गोली मारी गई और उनकी लाशें नहर में फेंक दी गईं। इनमें से केवल पांच लोग बच पाए, जिन्हें पीएसी के जवानों ने गोली मारने के बाद मरा समझ कर छोड़ दिया था। यही वहां से जान बचाकर भाग पाए और यह लोमहर्षक घटना जनता के सामने आई थी।

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