राम मंदिर के 'रण' में कूदे कांग्रेस के करीबी स्वरूपानंद, 21 फरवरी को 'अयोध्या कूच' का ऐलान किया

By Siddhartha RaiFirst Published Jan 30, 2019, 7:42 PM IST
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राम मंदिर को लेकर विश्व हिंदू परिषद प्रयागराज में 31 जनवरी और पहली फरवरी को धर्म संसद करने जा रही है। बुधवार को स्वरूपानंद सरस्वती ने अलग से एक धर्म संसद कर मंदिर मुद्दे पर संघ परिवार से आगे रहने का प्रयास किया है। 

सॉफ्ट हिंदुत्व के एजेंडे को धार देने की कोशिशों में जुटी कांग्रेस हिंदुओं की आस्था से जुड़े राम मंदिर मुद्दे में पिछले दरवाजे से शामिल होने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस के करीबी माने जाने वाले शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती बुधवार को अचानक भाजपा, आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद के राजनीतिक अखाड़े में कूदे और 21 फरवरी को अयोध्या कूच का आह्वान कर दिया। ताकि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की कोशिशों में अपनी भागीदारी भी दिखाई जा सके।

राम मंदिर को लेकर विश्व हिंदू परिषद प्रयागराज में 31 जनवरी और पहली फरवरी को धर्म संसद करने जा रही है। बुधवार को स्वरूपानंद सरस्वती ने अलग से एक धर्म संसद कर मंदिर मुद्दे पर संघ परिवार से आगे रहने का प्रयास किया है। 

द्वारकापीठ के शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती की कांग्रेस से करीबी जगजाहिर है। वीएचपी के सूत्रों ने 'माय नेशन' को बताया कि यह 2019 के समर में बने रहने के लिए कांग्रेस की हताशा को दर्शाता है।

वीएचपी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा, 'उन्होंने एक बार फिर मामले का राजनीतिकरण कर दिया। इससे देश का माहौल खराब होगा। स्वरूपानंद मंदिर मुद्दे पर बार-बार आगे रहने की कोशिश करते रहे हैं। भले ही वह कांग्रेस के साथ मिलकर हो या स्वतंत्र रूप से। हालांकि इससे कुछ हासिल नहीं हुआ है। उनकी कोशिशें हमेशा नाकाम रही हैं।'

इस बीच, 'माय नेशन' से बात करते हुए वीएचपी के अंतरराष्ट्री महासचिव सुरेंद्र जैन ने कहा कि विश्व हिंदू परिषद द्वारा बुलाई गई धर्मसंसद ही 'असली' होगी और वही राम मंदिर को लेकर आगे की दिशा तय करेगी। उन्होंने कहा, 'स्वामी स्वरूपानंद कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन यह बात स्पष्ट है कि आज राम मंदिर आंदोलन जिस ऊंचाई पर पहुंचा है, उसका श्रेय उस धर्म संसद को दिया जा सकता है जो 31 जनवरी और पहली फरवरी को होने वाली है।'

जैन ने कहा, '1984 में जिस धर्म संसद का आह्वान किया गया था उसी के चलते राम मंदिर आंदोलन इस ऊंचाई पर पहुंचा। हमारी धर्म संसद में जो फैसले लिए जाएंगे, उन पर दुनिया की नजर लगी हुई है।'

पहले धर्म संसद 7-8 अप्रैल, 1984 को दिल्ली में आयोजित की गई थी। इसमें 'अयोध्या, मथुरा और काशी में मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा बनाई गई तीन मस्जिदों को तोड़ने' का आह्वान किया गया था। 

ठीक दस साल बाद, 1994 में हरिद्वार में ऐसी ही धर्म संसद हुई थी। जब कहा गया था कि अयोध्या में नौ नवंबर से विवादित भूमि पर कब्जा कर राम मंदिर का निर्माण शुरू कर दिया जाएगा। 

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