जिन्ना की मौत के साथ ही खत्म हो गया था पाकिस्तान का सेक्यूलरिज्म, ये है सबूत

Published : Aug 14, 2019, 06:58 PM ISTUpdated : Aug 14, 2019, 08:07 PM IST
जिन्ना की मौत के साथ ही खत्म हो गया था पाकिस्तान का सेक्यूलरिज्म, ये है सबूत

सार

जब पाकिस्तान 14 अगस्त 1947 को आजाद हुआ था तो पाकिस्तान को एक कौमी तराने की जरूरत थी। ताकि देश को एक तराने के जरिए बांधा जा सके। इसके लिए जिन्ना ने जगन्नाथ आज़ाद से संपर्क किया। वह भी बड़े चकित थे कि एक कट्टर सोच रखने वाला मुस्लिम नेता कैसे एक हिंदू से कौमी तराना लिखा सकता है। लेकिन जिन्ना को ये लगा कि इसके जरिए वह अपने सेकुलर छवि पूरे विश्व में भुना सकते हैं। लेकिन जिन्ना की मौत के बाद उनका लिखा तराना बदल दिया गया। 

नई दिल्ली। पूरी दुनिया में आतंकी की फैक्ट्री के तौर पर पहचाने जाने वाला पाकिस्तान आज अपनी आजादी का जश्न मना रहा है। धर्म के नाम पर भारत से अलग हुए पाकिस्तान के कायदे आजम मो.अली जिन्ना का सेकुलरिज्म ने महज एक साल में ही दम तोड़ दिया था। क्योंकि पाकिस्तान की आजादी पर लिखा गया पहला कौमी तराना हिंदू ने बनाया था और जिन्ना और उनके करीबी ये कभी नहीं चाहते थे कि मुस्लिम देश में किसी काफिर का कौमी तराना गूंजे। लिहाजा उन्होंने एक साल में ही इस बदल दिया। हालांकि इस गीत को कौमी तराने बनाने की पहल जिन्ना ने ही थी। तब जिन्ना पाकिस्तान और अपनी छवि को सेकुलर पेश करना चाहते थे।

जब पाकिस्तान 14 अगस्त 1947 को आजाद हुआ था तो पाकिस्तान को एक कौमी तराने की जरूरत थी। ताकि देश को एक तराने के जरिए बांधा जा सके। इसके लिए जिन्ना ने जगन्नाथ आज़ाद से संपर्क किया। वह भी बड़े चकित थे कि एक कट्टर सोच रखने वाला मुस्लिम नेता कैसे एक हिंदू से कौमी तराना लिखा सकता है। लेकिन जिन्ना को ये लगा कि इसके जरिए वह अपने सेकुलर छवि पूरे विश्व में भुना सकते हैं। क्योंकि उन पर कट्टर मुस्लिम होने का तमगा लगा हुआ था। इसके जरिए जिन्ना ने अपनी राजनीतिक गोटियां सेंकने की सोची थी। 

जिन्ना को पाकिस्तान बन जाने के बाद नए मु्ल्क के लिए एक परचम और एक कौमी तराने की जरूरत थी। हालांकि जिन्ना पहले ही कह चुके थे कि मुस्लिम लीग का परचम यानी झंडा ही पाकिस्तान का परचम होगा। अब जरूरत पड़ी कौमी तराने की। क्योंकि भी तक पाकिस्तान का कौमी तराना नहीं था। इसके लिए जिन्ना ने अपने सलाहकारों से बातचीत की और अपनी और पाकिस्तान की सेकुलर छवि को बनाने के लिए उन्होंने उस वक्त लाहौर के जाने माने उर्दू शायर जगन्नाथ आज़ाद से बात की।

आजाद हिंदू थे और वह भी जिन्ना के इस फैसले को समझ नहीं पा रहे थे। जिन्ना ने जगन्नाथ को कौमी तराना लिखने के लिए पांच दिन का समय दिया और उन्होंने तराना लिखा। हालांकि जिन्ना की ये बात मुस्लिम नेताओं को ये बात पसंद नहीं आई तो वही सवाल उठाया कि एक काफिर कैसे मुस्लिम देश का कौमी तराना लिख सकता है। लेकिन सब जिन्ना के आगे मजबूर थे। 

इसके बाद दिसंबर 1948 में पाकिस्तान ने सांस्कृतिक मामलों के मंत्री सरदार अब्दुल रिफ़त की अगुवाई में 'कौमी तराना'  कमेटी का गठन किया गया। इसका काम देश के लिए नया कौमी तराना तैयार करना था। हालांकि जिन्ना ने आजाद के तराने को कौमी तराना बना दिया। लेकिन बाद में इसे हटा दिया गया। हालांकि इसके बाद जतो इसे पाकिस्तान का कौमी तराना बना दिया और उसके बाद जिन्ना की भी मौत हो गई और जगन्नाथ आज़ाद बाद में भारत आ गए।

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