मुन्नी से ज्यादा बदनाम हो चुके हैं केजरीवाल

Published : Mar 25, 2019, 05:48 PM ISTUpdated : Mar 27, 2019, 07:56 PM IST
मुन्नी से ज्यादा बदनाम हो चुके हैं केजरीवाल

सार

अरविन्द केजरीवाल, ये नाम भारतीय राजनीति से जब जुड़ा था तो इस वायदे के साथ जुड़ा था कि देश में एक राजनीतिक बदलाव आएगा, देश में धर्म, जाति, समुदाय के नाम पर हो रही राजनीति से उठकर विकास और मुद्दों की राजनीती होगी | किसे मालूम था कि अरविन्द केरीवाल जो आये दिन धरना, अनशन पर बैठकर कालेधन कुबेरो के नाम की सूची निकलते हैं वो एक दिन खुद उन्ही की चरणों में नतमस्तक होकर गठबंधन की गुहार लगएंगे|

नई दिल्ली: वैसे राजनीति शब्द का अर्थ ही सत्ता लोभ समझा जाता रहा है लेकिन फिर भी हर एक राजनीतिक पार्टी का एक स्थिर समय होता है और फिर एक अंतराल की बाद उसमें बदलाव आने लगते हैं जब वो अपनी विचारधारा से परे सत्ता बचाने के लिए गठजोड़ करती है |


लेकिन अरविन्द केजरीवाल और आप पार्टी को पार्टी बने हुए अभी पूरे 5 साल भी नहीं हुए।  इस पार्टी ने  अपना पहला  कार्यकाल भी पूरा नहीं किया और अपने "मौलिक सिद्धांतों" को ताक पर रखकर, जिनके खिलाफ पार्टी बनाई थी  उसी कांग्रेस की सामने हाथ फैला रहे हैं। वह कांग्रेस को लगातार लूट, भ्रष्टाचार और जनता विरोधी बता कर आरोप लगा रहे थे। जिससे लोगों का भरोसा उनपर जमा था। आईए नजर डालते हैं केजरीवाल की कमियों पर- 

1.    अराजक सोच  

शुरुआत से केजरीवाल ने हलकी और निम्नस्तर राजनीति का परिचय दिया हैं , जब वो पहली बार सत्ता में 49 दिनों की लिए आये थे, उस वक़्त भी उन्होंने  "बच्चों की झूठी कसम" खाकर कांग्रेस का समर्थन लिया था। लेकिन तब लोगो ने उनके इस अनैतिक कदम को नज़रंदाज़ सिर्फ इसलिए कर दिया क्योंकि लोगों को तब भी यकीन था कि वो अलग हैं और उनकी बातो में दम है। 

 लेकिन जैसे जैसे समय बीतता गया अरविन्द केजरीवाल ने एक की बाद एक ऐसी गैरज़िम्मेर हरकतें की कि जिसे देखकर केवल जनता ही नहीं बल्कि उनके अपनी पार्टी के लोग उन्हें अराजक कहने लगे| 

पार्टी से सबसे पहले अलग होने वालो में शामिल योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने अरविन्द केजरीवाल की कार्यशैली को अराजक बताया था | लेकिन जनता को इसका परिचय तब मिला जब केजरीवाल ने एक की बाद एक संवैधानिक संस्थाओ और उनके कार्यों पर ऊँगली उठने शुरू कर दी चाहे वो चुनाव आयोग हो या दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर, केजरीवाल ने दोनों को ही सरकारी एजेंट बताया| 

यही नहीं जब जेएनयू में भारतीय सेना, सुप्रीम कोर्ट और देश विरोधी नारे लगे, केजरीवाल ने उस वक़्त भी इससे अभिव्यक्ति कि आज़ादी से जोड़ कर इसका बचाव किया | 

जब भारतीय सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक की तो केजरीवाल उन नेताओ में से थे जिन्होंने एक पर्सनल वीडियो मैसेज जारी करके सरकार और सेना से उसका सबूत माँगा था | और ये बात उन्होंने हाल ही में हुई बालाकोट एयर स्ट्राइक की बाद फिर से दोहराई थी |  आम आदमी पार्टी के विधायक कपिल मिश्रा ने केजरीवाल पर खालिस्तानी संगठन से चुनावी फण्ड लेने के आरोप लगया था और यही बात एक नए मीडिया संस्थान ने अपने स्टिंग ऑपरेशन में साबित भी की थी। 

 चाहे वो कुमार विश्वास हों, कपिल मिश्रा हो या अलका लाम्बा, जिन्होंने हाल ही में दिए हुए एक इंटरव्यू में केजरीवाल पर पार्टी के  अन्य सदस्यों की साथ अभद्र भाषा प्रयोग करने के इलज़ाम लगाया था।  इन सभी बातों और बीते लगभग 5 सालों में आप आदमी पार्टी की राजनीति को देखकर कोई भी कह सकता है कि केजरीवाल अराजकता का दूसरा नाम बन गए हैं । 

2.    शिष्टाचार से भ्रष्टाचार

केजरीवाल की सत्ता में आने और पार्टी बनाने के मूल सिद्धांत "लोकपाल" और "कालाधन" थे।  2013- 2014 में दिल्ली के सत्ता की गलियारों में एक ही आवाज सुनाई पड़ती थी "लोकपाल"|  लेकिन वक्त सच को बाहर ले ही आता है। कोयल और कौए की पहचान उनके बोलते ही साफ़ हो जाती है |

 केजरीवाल के हाथ में जैसे ही सत्ता आई उनके महत्वकांक्षा बढ़ गई।  अभी उन्होंने दिल्ली का चुनाव जीता ही था कि प्रधामंत्री बनने की ख्वाहिश उन्हें बनारस ले गई।  जहां उन्होंने नरेंद्र मोदी को टक्कर देने की कोशिश की। हालांकि उन्हें करारी हाल मिली। 
 लेकिन इस बात ने उनके दोगले चरित्र को जनता के  सामने लाकर खड़ा कर दिया जो वो कहते आये थे कि मैं "चुनाव लड़ने नहीं आया हूँ मुझे सत्ता के लालच नहीं है"। 

लेकिन ये बात झूठ निकली | 2014 से 2019 तक ऐसा कोई चुनाव नहीं है जो आप पार्टी ने न लड़ा हो यहाँ तक की नागालैंड तक में पार्टी ने चुनाव लड़ डाला| 

लेकिन सत्ता की इस लालच में केजरीवाल और आप पार्टी के मूल सिद्धांत धूमिल होते गए और नौबत यहाँ तक आ गई कि जो अरविंद केजरीवाल भ्रष्ट नेताओं को जेल भेजने की बातें करते थे, वो लालू जैसे चारा घोटाले के सजायाफ्ता की गले लगाने लगे।  

हद तो जनता ने तब देखी जब कर्नाटक मुख्यमंत्री कुमारस्वामी की शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए गए केजरीवाल ने एक पांच सितारा होटल में महज चार घंटो में 80 हज़ार सिर्फ अपने पीने की शौक में उड़ा दिए | 

यही नहीं ये वही अरविन्द केजरीवाल हैं जिन्होंने काला धन की सूची में 2G घोटाले में लिप्त डी-राजा को "चोर" बताया था और बाद उन्हीं से हाथो में हाथ डाले हुए सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरें वायरल हुईं। 
 
 अब नौबत तो यहाँ तक आ चुकी है कि जो केजरीवाल लोकपाल की बातें करते थे उन्होंने खुद अपनी और पार्टी के 50 विधायकों ने लोकायुक्त को सम्पति के ब्योरा देने से मना कर दिया। फिर भी आये दिन उनके विधायक आयकर विभाग का चक्कर काट रहे हैं और CBI की छापों में उनके विधायकों के यहां से करोड़ों रूपये कैश मिल रहा है। यही नहीं आम आदमी पार्टी जो अपने पार्टी को मिले चंदे का बयोरा अपनी पार्टी वेबसाइट से हटा लिया है|

 अब तो उनकी पार्टी के पुराने उमीदवार और कार्यकर्ता खुद ये मानते हैं कि अरविन्द केजरीवाल के लिए  "कालाधन "अब मुद्दा नहीं बल्कि सत्ता लोभ के लिए एक साझेदारी बन गया है |


3. हिन्दू-धर्म विरोधी सोच- 

2014  में बड़ी-बड़ी बाते करने वाले केजरीवाल ने बीजेपी और कांग्रेस पर धर्म के नाम पर राजनीति करने और लोगों को बांटने का आरोप लगाया था।  तब केजरीवाल धर्म की नाम पर चल रही राजनीति को ख़त्म करने के दावे करते थे परन्तु आज केजरीवाल धर्म के नाम पर खुद ही सबसे ओछी राजनीती कर रहे हैं|  हाल ही में केजरीवाल अपने विधायक अमानतुल्ला खान की पक्ष में 2019 में वोट मांगने की लिए मुस्लिम समुदाय को सम्बोधित कर रहे थे तो उन्होंने ये खुले आम मंच से कहा कि "सारे मुस्लिम एक हो जाओ और बीजेपी की खिलाफ वोट करो"। 

 ये वीडियो क्लिप जैसे ही सोशल मीडिया में वायरल हुई तो तो लोगों ने केजरीवाल की जमकर आलोचना की।  यहाँ तक कि उनकी पूर्व साथी कुमार विश्वास ने उन्हें "सत्ता लोभी आत्मा मुग्ध बौना" कह दिया| 

लेकिन केजरीवाल कहाँ रुकने वाले थे हाल में केजरीवाल ने एक ट्वीट करके फिरसे "हिन्दू" धर्म का  अपमान किया हैं केजरीवाल ने ये ट्वीट को इतने हलके और गैरजिम्मेदार तरीके से किया की उन्होंने अपनी हल्की राजनीती ही नहीं अपने मानसिक असंतुलित होने का सबूत दिया हैं।  केजरीवाल ने एक फोटो ट्वीट की जिसमें "एक व्यक्ति झाड़ू लेके दूसरे व्यक्ति को मारने के लिए खदेड़ रहा हैं और दूसरे व्यक्ति को हिन्दू धर्म के "स्वस्तिक" चिन्ह की रूप में दिखाया गया हैं | 


केजरीवाल की इस ट्वीट ने हिन्दू धर्म के लोगों को बहुत आहत किया हैं और लोगों ने इसे राजनीती से परे अपने धर्म के अपमान माना हैं |

 हालांकि ये पहली बार नहीं हैं जब केजरीवाल ने सीधे तौर पर हिन्दू धर्म के मज़ाक उड़ाया है। पिछले साल भी उन्होंने "बलात्कार " जैसे संगीन जुर्म की ऊपर ट्वीट करते हुए "हिन्दू लड़के और हिन्दू लड़कियों" जैसे शब्दों के प्रयोग किया था | 

और अब केजरीवाल ने राजनीति के एक और  निम्न स्तर को छुआ है, उन्होंने एक अनजान वीडियो को बिना उसके बारे में जाने ट्विटर पर पोस्ट करके बेखौफ हिन्दू धर्म की ग्रंथो के अपमान अपनी ओछी राजनीती की लिए किया है केजरीवाल ने इस बार हिन्दू धर्म ग्रंथो के भी अपमान किया है | 

4. सवाल है केजरीवाल ऐसी "नीच" राजनीती क्यों कर रहें है? 

इसका जवाब आपको 2019 की चुनाव से ही मिल जायेगा, दिल्ली में 12.9% मुस्लिम आबादी है। केजरीवाल अपने हाथ-पांव-नाक सब रगड़ कर भी कांग्रेस को गठबंधन की लिए राजी नहीं कर पाए और अब केजरीवाल को को सत्ता लोभ में यह डर सता रहा है कि अगर मुस्लिम वोट अगर बंट गया तो उसका सीधा सीधा फायदा बीजेपी को होगा। इसलिए वो मुस्लिमों को लुभाने की लिए हिन्दू विरोधी बाते कर रहे हैं ताकि मुस्लिम समुदाय के वोटों का ध्रुवीकरण कर सकें और अपने लिए वोट बटोर सकें|  जिसकी अपील वो सीधा सीधा कर भी चुके हैं।  केजरीवाल हिन्दू धर्म को अपनी ध्रुवीकरण की राजनीती लिए एक हथकंडा बना लिया है जिसका वो आए दिन इस्तेमाल कर रहे हैं |


एक बात तो जनता समझ चुकी है की केजरीवाल का  मकसद सिर्फ सत्ता का विस्तार और अपनी राजनीति चलाना है।  अब चाहे इसके लिए उन्हें खालिस्तानियों से हाथ मिलाना पड़े या देश विरोधी बयान देना पड़े। उन्हें किसी भी तरीके से परहेज नहीं है।  जिस कालेधन को झूठा मुद्दा बनके उन्होंने 2014 में दिल्ली में कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ा था।  आज 2019 में उसी कांग्रेस की साथ को पाने लिए उन्होंने पूरा जोर लगा दिया|  और अब उनकी नजर दिल्ली की सात लोकसभा सीटो पर है। जिसके लिए वह हिन्दू विरोधी तरीके अपना रहे हैं | 

 लेकिन एक बात तो तय है कि देश के राजनीति इतिहास में ऐसा कम ही हुआ है। जब एक नयी पार्टी ने सत्ता के लिए इतने कम समय में ही अपने मौलिक सिद्धांतो को बेच दिया| और अब हाल ये है की केजरीवाल  "मुन्नी से ज़्यादा बदनाम है " 

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