जानें क्यों नीतीश कुमार के साथ रह कर ममता की भाषा बोल रहे हैं पीके

Published : Dec 12, 2019, 01:42 PM IST
जानें क्यों नीतीश कुमार के साथ रह कर ममता की भाषा बोल रहे हैं पीके

सार

प्रशांत किशोर को नीतीश कुमार का करीबी माना जाता है। पिछले विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर ने नीतीश कुमार के लिए चुनाव प्रबंधन संभाला था और अब वह पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी के लिए चुनाव प्रबंधन संभाल रहे हैं। लेकिन नागरिता संशोधन बिल पर प्रशांत किशोर नीतीश कुमार के फैसले के खिलाफ विरोध जता रहे हैं।

नई दिल्ली। जनता दल यूनाइटेड के उपाध्यक्ष और नीतीश कुमार के करीबी प्रशांत किशोर यानी पीके नागरिकता संशोधन बिल पर नीतीश कुमार के खिलाफ बागी रूख अपनाए हुए। प्रशांत किशोर लगातार इस मामले में नीतीश कुमार के फैसले का विरोध कर रहे हैं। जबकि नीतीश कुमार ने इस बिल के लिए केन्द्र सरकार को समर्थन दिया है। पीके के साथ ही पार्टी के दो अन्य नेता इस फैसले का विरोध कर रहे हैं।

प्रशांत किशोर को नीतीश कुमार का करीबी माना जाता है। पिछले विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर ने नीतीश कुमार के लिए चुनाव प्रबंधन संभाला था और अब वह पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी के लिए चुनाव प्रबंधन संभाल रहे हैं। लेकिन नागरिता संशोधन बिल पर प्रशांत किशोर नीतीश कुमार के फैसले के खिलाफ विरोध जता रहे हैं। जदयू में सभी बड़े फैसले नीतीश कुमार लेते हैं और कोई भी इन फैसलों पर सवाल नहीं उठाता है।

लेकिन प्रशांत कुमार बागी होकर खुले तौर पर नीतीश कुमार के इस फैसले के खिलाफ बयान दे रहे हैं और सोशल मीडिया में टवीट कर रहे हैं। जिसको लेकर पार्टी को असहज की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। नागरिकता संशोधन बिल को लेकर जदयू ने पहले से ही स्टैंड लिया हुआ है। जबकि तीन तलाक बिल के मुद्दे पर जदयू ने विरोध जताया था और सदन से वॉकआउट किया था। लेकिन नागरिकता बिल पर नीतीश कुमार  खुलेतौर पर केन्द्र सरकार के साथ दिखाई दे रहे हैं।

असल में प्रशांत किशोर पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के लिए चुनावी रणनीति तैयार कर रहे हैं। वहीं ममता बनर्जी इस बिल का विरोध कर रही हैं। जानकारों के मुताबिक प्रशांत किशोर की ममता बनर्जी से नजदीकियां बढ़ीं हैं। वहीं प्रशांत किशोर के साथ पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव पवन वर्मा भी खुलेतौर पर नीतीश कुमार का विरोध कर रहे हैं।

असल में पिछले दिनों भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने साफ कर दिया था कि बिहार में अगले साल होने वाले चुनाव नीतीश कुमार की अगुवाई में ही लड़े जाएंगे और भाजपा राज्य में जदयू की सहयोगी रहेगी। उसके बाद नीतीश कुमार के रूख में बदलाव आया है। जबकि इससे पहले तीन तलाक के मुद्दे पर नीतीश कुमार ने केन्द्र सरकार विरोध किया था।
 

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