
मुंबई। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की नजर राजभवन पर लगी हुई है। ठाकरे को राजभवन से राज्यपाल के आदेश का इंतजार है और अगर राज्यपाल ने राज्य कैबिनेट के प्रस्ताव के मंजूर नहीं किया तो राज्य में संवैधानिक संकट आ सकता था। राज्यपाल के पास महज छह दिन बचे हैं, जिसमें उन्हें राज्य कैबिनेट के प्रस्ताव को मंजूर कर उद्धव ठाकरे को विधान परिषद का सदस्य घोषित करना है। हालांकि राज्य के सीएम होने के बावजूद ठाकरे किसी भी सदन के सदस्य नहीं है।
उद्धव ठाकरे को राज्य के विधान परिषद के सदस्य के तौर पर नामांकन किए जाने के राज्य कैबिनेट के प्रस्ताव पर राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने अभी तक कोई फैसला नहीं किया है। जिसको लेकर राज्य सरकार और राजभवन में तकरार चल रही है। वहीं भाजपा नेता चंद्रकांत पाटिल के बयान के बाद राजनीति गरमा गई है। पाटिल ने कहा कि ठाकरे को एमएलसी के रूप में नियुक्त करने के लिए राज्यपाल पर 'दबाव' डालना अच्छा नहीं है।
राज्य कैबिनेट ने इस महीने 9 तारीख को ही राज्यपाल को उनके कोटे से उच्च सदन में उद्धव ठाकरे को भेजने के लिए प्रस्ताव भेजा था। हालांकि अभी तक राज्यपाल ने इस पर फैसला नहीं किया है। जिसको लेकर शिवसेना और राज्य सरकार राज्यपाल से नाराज दिख रही है। शिवसेना नेता संजय राउत ने सोमवार को कहा था कि यह जानना जरूरी है कि कोश्यारी को राज्य मंत्रिमंडल की सिफारिश को मंजूरी देने से कौन रोक रहा है। राउत ने कहा था कि कोशियारी का भाजपा के साथ जुड़ाव गुप्त नहीं है, लेकिन यह राजनीति में शामिल होने का समय नहीं है।
गौरतलब है कि ठाकरे ने 28 नवंबर 2019 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। लिहाजा संविधान के तहत उन्हें 28 मई, 2020 तक विधायिका का सदस्य बनना जरूरी है। इस महीने ही राज्य मंत्रिमंडल ने सिफारिश की कि उन्हें राज्यपाल के कोटे से परिषद में नामित किया जाए।
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