जानें क्यों पश्चिम बंगाल में पेड़ों में रहने को मजबूर हैं प्रवासी

By Team MyNationFirst Published Mar 30, 2020, 11:50 AM IST
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देशभर के विभिन्न राज्यों में कोरोना वायरस के कारण प्रवासी मजदूर अपने अपने घरों के लिए लौट रहे हैं। हालांकि अभी तक गांवों तक कोरोना वायरस नहीं फैला है जो राहत की बात है। अब गांवों में भी कोरोना को लेकर जागरूकता आने लगी है। गांवों में जो भी लोग बाहर से आ रहे हैं उन्हें क्वारंटीन करने को कहा जा रहा है।

कोलकाता। देशभर में कोरोना वायरस के खौफ के कारण प्रवासी मजदूर अपने अपने गांवों की तरफ रूख कर रहे हैं। गांवों के लोगों में कोरोना वायरस को लेकर जागरूकता आ रही है और वहां पर उन्हें क्वारंटीन के नियमों के बीच गुजरना पड़ रहा है। पश्चिम बंगाल में प्रवासी मजदूरों को सामाजिक दूरी के चलते पेड़ों पर रहना पड़ रहा है।  इसके लिए गांव की पंचायत ने कोरोना वायरस के प्रकोप के देखते हुए गांव के पेड़ों में 14 दिनों के लिए रहने के लिए कहा है।

देशभर के विभिन्न राज्यों में कोरोना वायरस के कारण प्रवासी मजदूर अपने अपने घरों के लिए लौट रहे हैं। हालांकि अभी तक गांवों तक कोरोना वायरस नहीं फैला है जो राहत की बात है। अब गांवों में भी कोरोना को लेकर जागरूकता आने लगी है। गांवों में जो भी लोग बाहर से आ रहे हैं उन्हें क्वारंटीन करने को कहा जा रहा है। हालांकि गांवों में अस्पताल नहीं है।

 लेकिन इसके लिए लोगों ने अलग ही तरीका अपनाया है। इसके तहत अब पेड़ों पर रह रहे हैं। लॉकडाउन के बीच सामाजिक दूरी बनाने के लिए पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में गांव लौटे प्रवासी अगले 14 दिनों तक पेड़ों में रहेंगे। जिले के बलरामपुर गांव में प्रवासी मजदूरों के परिवारों को ग्रामीणों ने अलग कर दिया है और पेड़ पर शरण लेने के लिए कहा है। जिसके बाद ये लोग पेड़ों में चारपाई डालकर रह रहे हैं।

स्थानीय विधायक शांतिराम महतो के मुताबिक पिछले शुक्रवार को लौटे प्रवासी लोगों को 14 दिनों तक अलग रहने की सलाह दी गई है। घरों में पर्याप्त जगह नहीं होने के कारण वे पेड़ों खाट डालकर रह रहे हैं।  ये सामाजिक दूरी बनाना का सबसे अच्छा तरीका है। इससे कोरोना वायरस को फैलने से रोका जा सकेगा। एक ग्रामीण बताया कि गाँव के बाहर उनके लिए एक अलग जगह निर्धारित की गई है जहां वे स्नान कर सकते हैं, कपड़ा साफ कर सकते हैं। गांव के लोगों ने उनके लिए सभी तरह की वस्तुएं मुहैया कराई है और उन्हें  कंबल और कपड़े दिए गए हैं।

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