
कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सलाह दिया कि वो चाहे तो चुनाव आयोग में अर्जी दाखिल कर सकते है। जनहित याचिका में मांग की गई थी जिन लोगों को 5 साल की सजा के मामले में आरोप तय हो चुके है, उन्हें राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर मान्यता प्राप्त पार्टियों के टिकट नहीं देने का नियम हो, जिससे कि राजनीति में आपराधियो के आने का रास्ता बंद हो सके।
याचिका में यह भी कहा गया था कि अगर अपराधियों को राजनीतिक दल टिकट देते है तो उनकी मान्यता को रद्द करने की मांग की गई थी। साथ ही कहा गया था कि राजनीतिक दल दागी को टिकट देता है तो उस पार्टी की मान्यता रद्द कर दिया जाए।
याचिका में चुनाव आयोग को निर्देश देने की भी मांग की गई थी।
गौरतलब है कि याचिकाकर्ता ने मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट में इससे संबंधित तमाम आंकड़े दिया गया था। जो यह दर्शाता है कि राजनीति में अपराध काफी बढ़ा है, और दागी नेताओं की एंट्री हुई है।
याचिका में कहा गया था कि 1968 के चुनाव आचार संहिता के नियमों में बदलाव किया जाए और गंभीर आरोप के दागियों को टिकट नहीं दिया जाए। चुनाव आयोग को अनुच्छेद 324 के तहत इस तरह का व्यापक निर्देश जारी करने का अधिकार है।
इसमें कहा गया था कि इसके लिए चुनाव आयोग को अलग से पड़ताल करने की जरूरत नही होगी। क्योंकि उम्मीदवार अपने खिलाफ लंबित मामलों की जानकारी अपना नामांकन पत्र में देते है, जिसमें उनके खिलाफ धाराओं के भी जिक्र होता है।
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