
जम्मू में अंतरराष्ट्रीय सीमा से होने वाली किसी भी तरह की घुसपैठ को नाकाम बनाने के लिए सरहद पर अदृश्य दीवार शुरू कर दी गई है। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने सोमवार को जम्मू में कॉम्प्रेहेंसिव इंटीग्रेटेड बॉर्डर मैनेजमेंट सिस्टम के दो पायलट प्रोजेक्ट का उद्घाटन किया। राजनाथ ने जम्मू के पोलौरा स्थित बीएसएफ के मुख्यालय में इस प्रणाली की शुरुआत की। इस दौरान प्रधानमंत्री कार्यालय में मंत्री जितेंद्र सिंह और बीएसएफ के महानिदेशक भी मौजूद थे।
इस अवसर पर, राजनाथ सिंह ने कहा, ‘सीमा सुरक्षा हमारी सबसे शीर्ष प्राथमिकता है। मैं व्यापक एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली के तहत दो प्रायोगिक परियोजनाओं का उद्घाटन कर खुश हूं। हमने पहले ही सभी सीमाओं पर कुछ संवेदनशील क्षेत्रों और खाली स्थानों की पहचान कर ली है।’
उन्होंने कहा कि सरकार सीमा बुनियादी ढांचा को उन्नत करने की दिशा में कार्य कर रही है और सीमाई इलाकों में 600 किलोमीटर से अधिक लंबी सड़कों का निर्माण किया जा रहा है तथा सैकड़ों सीमा चौकियों का निर्माण किया गया है। उन्होंने कहा, ‘शुरू में सीआईबीएमएस परियोजना सीमा पर भौतिक बाड़ में खाली स्थान को भरने के लिए लागू होगी। इसके बाद इस तकनीकी समाधान को समूची सीमा पर लागू किया जाएगा।’
बीएसएफ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने 'माय नेशन' को कहा कि नई स्मार्ट बॉर्डर फेंस (दीवार) सीमा चौकी पर तैनात जवानों को घुसपैठ की संदिग्ध गतिविधि का पता लगाने में मदद मिलेगी। केंद्रीय गृहमंत्री ने पांच-पांच किलोमीटर के दो इलाकों में इसके पायलट प्रोजेक्ट की शुरूआत की है। यह अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बीएसएफ को कड़ी निगरानी रखने में मददगार होगी।
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यहां यह जिक्र करना जरूरी है कि हाल ही में जम्मू के झज्जर कोटली में मारे गए जैश-ए-मोहम्मद के तीन आतंकवादी सांबा में तरना नाला इलाके से भारतीय सीमा में घुसे थे। यह इलाका अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटा है और बीएसएफ की निगरानी में आता है।
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कॉम्प्रेहेंसिव इंटीग्रेटेड बॉर्डर मैनेजमेंट सिस्टम यानी सीआईवीएमएस। यह प्रणाली सेंसर्स एवं कमांड कंट्रोल से नियंत्रित होती है। ये एक ऐसी तकनीक है, जिससे जल, थल, नभ और सुरंग के जरिये होने वाली घुसपैठ को रोक जा सकता है।
अंतरराष्ट्रीय सीमा पर पांच-पांच किलोमीटर के दो इलाकों में पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। कॉम्प्रेहेंसिव इंटीग्रेटेड बॉर्डर मैनेजमेंट सिस्टम तीन हिस्सों में काम करता है। पहले हिस्से में एक "डिजिटल फेंस" होती है, जो देखने में महज एक रडार है लेकिन अपनी रेंज की हर हरकत को ट्रैक कर सकती है। दूसरा सबसे अहम हिस्सा है। इसमें कमांड और कंट्रोल से वर्चुअल फेंस को नियंत्रित किया जाता है। वहीं तीसरा, सिस्टम बिना किसी रुकावट चल सके, इसके लिए बिजली की आपूर्ति पर निरंतर नजर रखी जाती है।
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