कांग्रेस की अंदरूनी सियासत से भोपाल में घिरे दिग्विजय, दिल्ली लौटने की हसरतों पर मंडरा रहा खतरा

Arjun Singh |  
Published : Apr 19, 2019, 01:15 PM ISTUpdated : Apr 19, 2019, 01:19 PM IST
कांग्रेस की अंदरूनी सियासत से भोपाल में घिरे दिग्विजय, दिल्ली लौटने की हसरतों पर मंडरा रहा खतरा

सार

दिग्विजय भाजपा के गढ़ माने जाने वाले भोपाल से नहीं राजगढ़ से चुनाव लड़ना चाहते थे। कमलनाथ की सलाह पर पार्टी ने भोपाल से उतारा। कमलनाथ जानते थे भाजपा यहां से बड़े चेहरे को उतारेगी।

भोपाल के सियासी रण में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को उतारकर भाजपा ने कांग्रेस को बैकफुट पर धकेल दिया है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह यहां से कांग्रेस के उम्मीदवार हैं, लेकिन साध्वी प्रज्ञा की एंट्री ने उनके लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। दिग्विजय ऐसी सीट से लड़ रहे हैं, जहां उन्हें भेजा गया है। वह खुद इस सीट से लड़ने के इच्छुक नहीं थे। 

दिग्विजय की इच्छा के विपरीत पार्टी ने उन्हें यहां से उतारा। हालांकि यह चुनावी रणनीति से ज्यादा कांग्रेस की अंदरूनी सियासत है। इसे मध्य प्रदेश कांग्रेस में कमलनाथ बनाम दिग्विजय सिंह माना गया। दरअसल, दिग्विजय राजगढ़ से चुनाव लड़ने की इच्छा जता चुके थे। लेकिन पार्टी ने कमलनाथ की 'सलाह' पर दिग्विजय को भाजपा का गढ़ कही जाने वाली भोपाल लोकसभा सीट से उतार दिया। 

कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने टिकट मिलने से एक दिन पहले ही कहा था कि 'राज्यसभा में मेरा कार्यकाल 2020 तक है लेकिन पार्टी मुझे लोकसभा चुनाव लड़ाना चाहे तो मेरी पहली पसंद राजगढ़ सीट होगी। हालांकि, जहां से पार्टी कहेगी मैं वहां से भी चुनाव लड़ने के लिए तैयार हूं।' 

दरअसल, सीएम कमलनाथ इस समय कांग्रेस नेतृत्व के करीब हैं। वह पार्टी को यह संदेश देने में सफल रहे कि दिग्विजय को किसी कठिन सीट से चुनाव लड़ना चाहिए। यह उनकी सियासी बिसात थी। कमलनाथ की इस अपील को केंद्रीय चुनाव समिति ने मंजूर भी कर लिया। 

कमलनाथ को पता था कि भाजपा यहां से मजबूत उम्मीदवार उतारेगी। ऐसे में राज्य में पकड़ खो चुके दिग्विजय के लिए केंद्र की राजनीति में लौटना भी मुश्किल होगा। दिग्विजय की हार पार्टी में सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी पर बड़ी बढ़त दे जाएगी।

भोपाल सीट को भाजपा का गढ़ माना जाता है। 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा के उम्मीदवार आलोक सांजर ने 7.14 लाख वोट अपने नाम किए थे। जबकि कांग्रेस प्रत्याशी पीसी शर्मा को महज 3.43 लाख वोट ही मिले थे। 

दरअसल, केंद्र की राजनीति से हटकर दिग्विजय मध्य प्रदेश की सियासत में सक्रिय हो रहे थे। मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले 70 साल के दिग्विजय ने नर्मदा पदयात्रा की। इसके पार्टी के भीतर अपने प्रतिद्वंद्वियों को संदेश देने की कोशिश की। दिग्विजय अगर राजगढ़ से जीतते तो उनकी पकड़ और मजबूत हो जाती। 

दिग्विजय की दावेदारी तय होने के बाद से भाजपा में इस बात को लेकर मंथन हो रहा था कि भोपाल से किस हिंदूवादी चेहरे को उतारा जाए। यह कांग्रेस के ‘हिंदू आतंकवाद’ के जुमले को हमेशा के लिए दफन करने का सबसे सही मौका है। ‘हिंदू आतंकवाद’ शब्द को दिग्विजय सिंह ने ही सबसे पहले प्रयोग किया था। यही वजह है कि साध्वी प्रज्ञा से बेहतर कोई उम्मीदवार पार्टी के लिए नहीं हो सकता था। साध्वी प्रज्ञा के नाम पर संघ की भी सहमति थी। 

साध्वी प्रज्ञा को ‘हिंदू आतंकवाद’ के मामले में पूर्व की यूपीए सरकार ने जेल में भेजा था और अब साध्वी जमानत पर हैं। उन्हें एनआईए ने भी क्लीन चिट दे दी है। लिहाजा भाजपा के लिए यह दोतरफा फायदे वाला कमद है। एक तो ‘हिंदू आतंकवाद’ पर कांग्रेस पर हमला बढ़ेगा और दूसरा हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण अपने आप हो जाएगा। 

साध्वी प्रज्ञा ठाकुर का चुनाव अभियान ‘हिंदू आतंकवाद’ जैसे शब्द के ही इर्दगिर्द रहने वाला है। ऐसे में दिग्विजय के लिए इसका जवाब देना मुश्किल होगा। साथ ही वह अब मुस्लिम वोटरों तक पहुंचने की सार्वजनिक कोशिश से बचेंगे, क्योंकि यह उनकी संभावनाएं बढ़ाने के बजाय कम करेगा। 

कुल मिलाकर दिग्विजय भाजपा के निशाने पर थे ही, कांग्रेस की अंदरूनी सियासत ने मध्य प्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री रहे इस दिग्गज की केंद्र की राजनीति में वापसी की कोशिशों पर खुद ही सवाल खड़ा कर दिया है। 
 

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