तो इसलिए मोदी ने की मोहनलाल से मुलाकात

By Anshuman AnandFirst Published Sep 5, 2018, 5:49 PM IST
Highlights

बीजेपी दक्षिण के राज्यों में पांव फैलाने की कोशिश कर रही है। अगर रजनीकांत और मोहनलाल जैसे फिल्मी सितारों का जादू दक्षिण की जनता पर एक बार फिर से चल जाता है, तो बीजेपी को 2019 के लोकसभा चुनाव में इसका बहुत फायदा मिल सकता है। 

मलयालम फिल्म इंडस्ट्री यानी मॉलीवुड के सुपर स्टार मोहनलाल ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात क्या की, अटकलों का बाजार गर्म हो गया है। सोमवार को मोहनलाल से मुलाकात के बाद पीएम मोदी ने ट्वीट किया, कल (सोमवार को) मेरी मोहनलाल जी के साथ अच्छी बैठक हुई। उनकी विनम्रता प्रशंसनीय है। सामाजिक सेवा के क्षेत्र में उनके व्यापक प्रयास सराहनीय और बहुत प्रेरणादायी हैं।

दोनों में से किसी ने राजनीति के बारे में कोई जिक्र नहीं किया। लेकिन इनकी मुलाकात के तुरंत बाद कई तरह की खबरें आने लगीं। जिसमें सबसे दिलचस्प यह रही, कि बीजेपी मोहनलाल को तिरुअनंतपुरम से शशि थरुर के सामने खड़ा करना चाहती है। 

दूसरी खबर यह थी, कि मोहनलाल आरएसएस की पसंद हैं और वामदलों तथा कांग्रेस के गढ़ रहे केरल में मोहनलाल के करोड़ों प्रशंसकों का फायदा बीजेपी को मिल सकता है। आरएसएस मोहनलाल को बीजेपी में लाने के लिए बहुत दिनों से कोशिश कर रहा था। 

मोहनलाल और प्रधानमंत्री की इस मुलाकात के कई और भी मायने निकाले जा सकते हैं। लेकिन इसके पीछे का सबसे आसान तर्क यह है कि दक्षिण की राजनीति में रुपहले पर्दे के सितारों का हमेशा बोलबाला रहा है। दक्षिण भारत के प्रशंसकों के लिए उनके फिल्मी सितारे भगवान से कम नहीं होते। चाहे वह तमिलनाडु में एक्टर से मुख्यमंत्री बने एमजीआर हों या जयललिता या पटकथा लेखक करुणानिधि। या फिर आंध्र प्रदेश में तीन बार मुख्यमंत्री रहे एनटी रामाराव। 

यह सभी रुपहले पर्दे से जुड़े रहे हैं। एमजीआर, जयललिता और एनटी रामाराव ने तो राजनीति में अपनी रुपहले की छवि को बहुत शानदार तरीके से भुनाया। खुद मोहनलाल ने अपनी फिल्म इरुवर में एमजीआर के ‘लार्जर दैन लाइफ’ किरदार को बखूबी निभाया था। तमिलनाडु में तो पिछले 50 सालों(1967) से रुपहले पर्दे से जुड़ी पार्टियों एआईडीएमके(अन्नाद्रमुक) और डीएमके(द्रमुक) का ही राज रहा है। तमिल राजनीति के पितामह माने जाने वाले अन्नादुरई की कई कहानियों पर भी फिल्में बन चुकी हैं। जो कि दर्शाता है कि दक्षिण भारत की राजनीति का मैदान फिल्मी सितारों के लिए कितना उर्वर रहा है। 
    
बीजेपी आंध्र और तमिलनाडु के उदाहरण को पूरे दक्षिण भारत में दोहराना चाहती है। क्योंकि दक्षिण की राजनीति में बीजेपी बहुत धीरे धीरे पांव जमा रही है। इसलिए पार्टी ने वहां अपने प्रसार के लिए फिल्मी सितारों के दशकों पुराने फॉर्मूले पर भरोसा दिखाया है। तमिलनाडु में बीजेपी की रजनीकांत से बातचीत चल रही है। वह भी सैद्धांतिक रुप से बीजेपी कुनबे का हिस्सा बनने के लिए तैयार हैं।

 इसके बाद केरल के लिए बीजेपी नेताओं ने आरएसएस की पहल पर मोहनलाल से मुलाकात की है। दोनों ही राज्य बीजेपी के लिए बेहद अहम हैं क्योंकि तमिलनाडु में लोकसभा की 39 और केरल में 20 सीटें हैं। 

उत्तर भारत में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, दिल्ली जैसे राज्यों में बीजेपी ने 2014 में बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए ज्यादातर सीटें जीत ली हैं। अब अगले लोकसभा चुनाव में इससे उपर बढ़ने की गुंजाइश बहुत कम है। ऐसे में बीजेपी दक्षिण के राज्यों में पांव फैलाने की कोशिश कर रही है। अगर रजनीकांत और मोहनलाल जैसे फिल्मी सितारों का जादू दक्षिण की जनता पर एक बार फिर से चल जाता है, तो बीजेपी को 2019 के लोकसभा चुनाव में इसका बहुत फायदा मिल सकता है।  
  
ऐसा नहीं है कि सिर्फ बीजेपी ही इस फॉर्मूले को जानती या समझती है। बाकी दल भी राजनीति में फिल्मी सितारों के इस्तेमाल की तकनीक आजमा रहे हैं। इसीलिए कमल हासन भी राजनीति के अखाड़े में उतर आए हैं। प्रकाश राज भी लगातार राजनीति में अपनी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। 

लेकिन मोहनलाल और रजनीकांत जैसे सितारों की बात ही अलग है। रजनीकांत ने 150 से ज्यादा फिल्मों में काम किया है और उनके 23 हजार से ज्यादा रजिस्टर्ड फैन क्लब हैं, जिनके सदस्यों की संख्या लाखों में है। उनकी फिल्में दुनियाभर में पसंद की जाती हैं।  

वहीं मोहनलाल चार बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत चुके हैं, उन्होंने 300(तीन सौ) से ज्यादा फिल्मों में काम किया है। वह एक्टर और सिंगर ही नहीं बल्कि फिल्म प्रोड्यूसर भी हैं। 2009 में भारतीय सेना ने उन्हें मानद लेफ्टिनेन्ट कर्नल का पद दिया, जो कि भारतीय सिनेमा के इतिहास में कभी नहीं हुआ। इसके अलावा उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया जा चुका है। समाजसेवा के कामों में भी वह बहुत आगे रहते हैं और मलयाली समाज में उनकी इज्जत बेहद ज्यादा है। 
   
अगर मोहनलाल बीजेपी के झंडे तले राजनीति में उतरते हैं, तो केरल में उसे इसका बहुत ज्यादा फायदा मिल सकता है। 

click me!