
नई दिल्ली: लोकसभा चुनाव में 16 सीटें जीतने के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बड़े ही अरमानों से दिल्ली आए थे। उनकी अमित शाह से चर्चा हुई। दोनों नेताओं के बीच आधे घंटे तक चर्चा हुई लेकिन नतीजा निकला शून्य।
नीतीश कुमार ने पीएम मोदी के शपथग्रहण में तो हिस्सा लिया। लेकिन अपने सांसदों को मंत्रिमंडल में शामिल होने नहीं दिया।
नीतीश कुमार ने इस पूरे घटनाक्रम पर इशारों इशारों में नाराजगी भी जताई। उन्होंने बयान दिया कि ‘जब मुझे बताया गया कि मात्र एक सीट जेडीयू को दी जाएगी, मैंने कहा था कि हमें इसकी आवश्यकता नहीं है। जिसके बाद मैंने जदयू कोर कमेटी में इस बात पर चर्चा की तो सभी ने कहा, यह उचित नहीं है कि हम सरकार में शामिल होकर अपनी भागीदारी दिखाएं। हम साथ हैं पर दुखी नहीं। सांकेतिक भागीदारी की कोई आवश्यकता नहीं है’।
उधर शिवसेना का भी हाल कुछ ऐसा ही है।
शिवसेना के कोटे से भी मात्र एक ही मंत्री बनाया गया है। मुंबई दक्षिण से शिवसेना सांसद अरविंद सावंत को भारी उद्योग मंत्रालय दिया गया है।
खबर है कि इससे शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे नाराज हैं। क्योंकि वह कम से कम तीन मंत्री पद की उम्मीद कर रहे थे।
पार्टी प्रवक्ता संजय राउत ने बयान दिया है कि 'विभागों को लेकर हमने कोई मांग नहीं रखी थी क्योंकि विभागों का बंटवारा प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार है। हालांकि उद्धवजी दिल्ली में थे और वह इस बारे में जानते हैं। बीजेपी नेतृत्व को एक संदेश भेजा गया है।'
बताया जा रहा है कि इस संदेश में शिवसेना ने अपनी नाराजगी का इजहार किया है।
शिवसेना को उम्मीद थी कि अगर उसे मात्र एक ही मंत्री पद मिलता है तो कम से कम स्वास्थ्य, संचार या रेलवे जैसा अहम मंत्रालय दिया जाता। उन्हें पिछले 21 साल में पांच बार से भारी उद्योग मंत्रालय ही दिया जा रहा है।
मंत्रालयों के बंटवारे को लेकर शिवसेना और जेडीयू दोनों ही अपनी बड़े सहयोगी दल बीजेपी से नाराज दिख रहे हैं।
खास बात यह है कि इन दोनो ही राज्यों में चुनाव होने वाले हैं। महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव 15 अक्टूबर 2014 को हुआ था।
यानी महाराष्ट्र विधानसभा का 5 साल अगले कुछ ही महीनों में पूरा होने वाला है। 288 सीटों की महाराष्ट्र विधानसभा में बीजेपी के पास 122 जबकि शिवसेना के पास 63 सीटें हैं। दोनों साथ मिलकर सरकार चला रही हैं।
लेकिन अगर दोनों ही दलों में केन्द्रीय मंत्रिमंडल में जगह पाने को लेकर विवाद होता है तो इसका असर राज्य विधानसभा चुनाव परिणामों पर दिखेगा। जिसका फायदा सीधे तौर पर विपक्षी कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को हो सकता है।
उधर बिहार में नवंबर 2015 में विधानसभा चुनाव हुए थे। 243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में जेडीयू के पास 71 सीटें हैं, जबकि बीजेपी के पास 53 सीटें हैं। दोनों ही पार्टियां राज्य में मिलकर सरकार चला रही हैं।
लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने केन्द्रीय मंत्रिमंडल में सीट बंटवारे को लेकर छिपे तौर पर अपनी नाराजगी जाहिर की है। उससे राज्य में जमीनी स्तर पर एनडीए गठबंधन को नुकसान हो सकता है।
क्योंकि बिहार में 80 सीटें जीतने वाली लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी सत्ता से बाहर है। एनडीए में किसी तरह के मतभेद का फायदा सीधे तौर पर उसे हासिल हो सकता है।
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