क्या हैं भाजपा के लिए दिल्ली हार के मायने, कहां फेल हो गई 'भगवा पार्टी'

Published : Feb 12, 2020, 06:23 AM IST
क्या हैं भाजपा के लिए दिल्ली हार के मायने, कहां फेल हो गई 'भगवा पार्टी'

सार

भाजपा दिल्ली की सत्ता से पिछले 27 वर्षों से बाहर है और अब उसे अगली लड़ाई के लिए पांच साल के लिए इंतजार करना होगा। चुनाव में भाजपा को महज आठ सीटें मिली हैं वहीं आप को 63 सीटें मिली हैं। जो पिछले विधानसभा चुनाव से चार सीटें कम है। लेकिन एक सच्चाई ये भी है कि भाजपा अपने लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन को दोहरा नहीं सकी। जबकि लोकसभा चुनाव हुए महज छह महीने ही हुए हैं। लिहाजा भाजपा को भी सोचना होगा कि कहां पर उससे गलती हुई है।

नई दिल्ली। पिछले एक साल के दौरान एक बड़े राज्य में भारतीय जनता पार्टी को हार का सामना करना पड़ा।  पिछले दो साल के दौरान भाजपा को लगातार आठवें राज्य में हार मिली है। लेकिन देश का दिल कहे जाने वाले दिल्ली में भाजपा के लिए हार के कई मायने हैं। क्योंकि दिल्ली का संदेश देश के हर कोने में जाता है। लेकिन भाजपा की बड़ी हार ने उसके सामने कई तरह के सवाल खड़े कर दिए हैं। 

भाजपा दिल्ली की सत्ता से पिछले 27 वर्षों से बाहर है और अब उसे अगली लड़ाई के लिए पांच साल के लिए इंतजार करना होगा। चुनाव में भाजपा को महज आठ सीटें मिली हैं वहीं आप को 63 सीटें मिली हैं। जो पिछले विधानसभा चुनाव से चार सीटें कम है। लेकिन एक सच्चाई ये भी है कि भाजपा अपने लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन को दोहरा नहीं सकी। जबकि लोकसभा चुनाव हुए महज छह महीने ही हुए हैं। लिहाजा भाजपा को भी सोचना होगा कि कहां पर उससे गलती हुई है।

क्या इसके ये मायते तो नहीं है कि लोग देश के हित में भाजपा को चाहते हैं लेकिन कल्याणकारी नीतियों के लिए उन्हें भाजपा पर भरोसा नहीं है और लिहाजा वह राज्य की कमान छोटे और राज्य स्तरीय दलों को देना चाहते हैं। भाजपा ने दिल्ली के विधानसभा चुनाव में शाहीन बाग और सीएए के मुद्दों को उठाया। लेकिन झारखंडों की तरह उसे यहां पर भी हार का सामना करना पड़ा। झारखंड में भाजपा ने स्थानीय मुद्दों के बजाए राष्ट्रीय मुद्दों को तवज्जो दी। जिसके कारण उसे हार मिली। वही गलती भाजपा ने दिल्ली में ही।

जबकि भाजपा केन्द्र के साथ ही दिल्ली के तीनों निगमों में काबिज है और उसकी पकड़ पूर्वांचल के वोट बैंक में मजबूत मानी जाती है। क्योंकि पूर्वांचल का दिल्ली में 35 फीसदी से ज्यादा का मतदाता है। अब भाजपा के सामने अगली चुनौती बिहार के विधानसभा चुनाव हैं। जहां का राजनैतिक गणित अन्य राज्यों की तुलना में अलग है।

बदलनी होगी रणनीति

असल में भाजपा के मैनेजरों और रणनीतिकारों को लगता है कि लोकसभा चुनाव की तरह वह राष्ट्रीय मुद्दों के जरिए राज्यों पर काबिज हो सकती है या फिर 2014 का फार्मूला फिर से उसे फायदा पहुंचाएगा। लेकिन ऐसा नहीं है और अब स्थितियां बदल  चुकी हैं। राज्यों के चुनावों में स्थानीय मुद्दे हावी रहते हैं और सभी राजनैतिक दल इन्हीं मुद्दों को उठाते हैं। वहीं भाजपा स्थानीय मुद्दों के साथ ही राष्ट्रीय मुद्दों पर जोर दे रही है।

मुफ्त की राजनीति 

दिल्ली चुनाव में एक बड़ा कारण जनता को मुफ्त में दी जाने वाली सुविधाएं हैं। क्योंकि आप सरकार ने दिल्ली की जनता को मुफ्त मे बिजली और पानी दिया है। जिसको लेकर जनता में खासा उत्साह है और वह मानती है कि मौजूदा महंगाई में बिजली  और पानी के बिल के कारण उसे राहत मिली है। जबकि केन्द्र की भाजपा लगातार टैक्स थोप रही है।

केजरीवाल के खिलाफ कमजोर प्रत्याशी

दिल्ली में भाजपा ने आप के अरविंद केजरीवाल की तुलना में किसी को सीएम का चेहरा नहीं बनाया। जबकि कई प्रदेशों में भाजपा ने पहले ही सीएम के चेहरे पर दांव खेला। लेकिन दिल्ली में भाजपा ने ऐसा नहीं किया। वहीं कांग्रेस के कमजोर होने से इसका सीधा फायदा आप को मिला।या यूं कहें कि कांग्रेस ने आप को जिता दिया है तो गलत नहीं होगा। दिल्ली में आप और भाजपा के अलावा जनता के पास कोई तीसरा विकल्प नहीं था। जिसका फायदा आप को मिला और कांग्रेस का वोट बैंक आप की तरफ गया।

हिंदुत्व और शाहीन बाग से नहीं मिला भाजपा को फायदा

भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव में हिंदुत्व और शाहीन बाग के मुद्दे को उठाया और इसके कारण उसे नुकसान हुआ। क्योंकि दिल्ली के वोटर और अन्य राज्यों के वोटरों में काफी अंतर है। दिल्ली का वोटर अपनी रोजमर्रा की जरूरतों पर ज्यादा ध्यान देता है वहीं ग्रामीण वोटर रोजमर्रा के मुद्दों के साथ ही जाति, धर्म और अन्य कई मुद्दों से प्रभावित होता है।

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