कौन हैं चंद्रयान-3 प्रोजेक्ट में जबरदस्त भूमिका निभाने वाली कल्पना कालाहस्ती?

Published : Aug 23, 2023, 07:25 PM ISTUpdated : Aug 24, 2023, 11:41 AM IST
कौन हैं चंद्रयान-3 प्रोजेक्ट में जबरदस्त भूमिका निभाने वाली कल्पना कालाहस्ती?

सार

चंद्रयान 3 मिशन की सफलता के साथ ही भारत ने चांद पर इतिहास रच दिया है। इस अंतरिक्ष मिशन में शामिल प्रमुख व्यक्तियों में एक नाम कल्पना कालाहस्ती का भी है जिन्होंने चंद्रयान 3 प्राेजेक्ट एसोसिएट डायरेक्टर के रूप में अपना अहम योगदान दिया।

रांची. 23 अगस्त को चंद्रयान 3 की चंद्रमा के साउथ पोल पर सफल लैंडिंग के साथ इसरो टीम की उपलधियों का डंका पूरी दुनिया में बज चुका है। भारत ने नया इतिहास रच दिया है। चंद्रयान 3 मिशन में शामिल सभी प्रमुख वैज्ञानिकों के साथ चंद्रयान -3 परियोजना के एसोसिएट डायरेक्टर के रूप में इस अंतरिक्ष अभियान से जुड़ी कल्पना कालाहस्ती ने भी अपनी बात पूरी दुनिया के सामने रखी और भारत की महिलाओं का सर गर्व से ऊंचा कर दिया। वैज्ञानिक कल्पना कालाहस्ती के संबोधन के बाद बजी तालियां इस बात का संकेत हैं कि हर क्षेत्र में भारत की महिलाएं अव्वल हैं।

कल्पना कालाहस्ती के पिता मद्रास हाई कोर्ट के कर्मचारी है, मां गृहिणी

चित्तूर जिले की कल्पना कालाहस्ती ने चेन्नई में बीटेक ईसीई की पढ़ाई की। पिता मद्रास हाई कोर्ट के कर्मचारी हैं. मां गृहिणी हैं. कल्पना बचपन से ही इसरो में नौकरी करने की ख्वाहिश रखती थीं और उन्होंने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया। 

साल 2000 में एक वैज्ञानिक के रूप में इसरो में शामिल हुईं कल्पना कालाहस्ती

बी.टेक पूरा करने के बाद वह 2000 में एक वैज्ञानिक के रूप में इसरो में शामिल हुईं। उन्होंने सबसे पहले श्रीहरिकोटा में पांच साल तक काम किया। 2005 में, उन्हें बैंगलोर के एक उपग्रह केंद्र में स्थानांतरित कर दिया गया और वहां उन्होंने कर्तव्यों का पालन किया। 

चंद्रयान 3 प्रोजेक्ट में एसोसिएट डायरेक्टर के रूप में कल्पना कालाहस्ती ने निभाई भूमिका

चंद्रयान 3 प्रोजेक्ट में एसोसिएट डायरेक्टर के रूप में काम करने वाल कल्पना कालाहस्ती ने अबतक पांच सेटेलाइट के डिजाइन में भाग लिया है। वह चंद्रयान-2 प्रोजेक्ट में भी शामिल रही हैं जिसे 2018 में श्रीहरिकोटा रॉकेट सेंटर से लॉन्च किया गया था। 

एक सैटेलाइट बनने में लगता है 5 साल

बता दें कि आमतौर पर एक सैटेलाइट बनाने में पांच साल से ज्यादा का समय लगता है। पहले डिजाइन, फिर हार्डवेयर आदि तैयार किये जाते हैं। ये सब हो जाने के बाद कई परीक्षण यानी टेस्ट किए जाते हैं और शार लाया जाता है। यहां दोबारा परीक्षण किया जाता है और रॉकेट से जोड़कर निंगी के पास भेजा जाता है।

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