क्या कांग्रेस की चुनावी नैया, गंगा मैया लगाएंगी पार

Published : Mar 19, 2019, 01:36 PM ISTUpdated : Mar 19, 2019, 03:51 PM IST
क्या कांग्रेस की चुनावी नैया, गंगा मैया लगाएंगी पार

सार

उत्तर प्रदेश में गंगा लोगों की आस्था और सामाजिक जीवन का एक अभिन्न अंग है। गंगा केवल एक नदी ही नहीं बल्कि एक परंपरा के साथ इसके किनारे बसने वालों के रोजगार का स्रोत भी है। इसके तट पर बसी आबादी का जातीय समीकरण भी दिलचस्प है। यहाँ पर ब्राह्मण, निषाद , दलित, मल्लाह के साथ अन्य पिछड़ों की आबादी भी अधिक है। इसी कारण से पिछले लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बनारस सीट को चुना था।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने लोक सभा चुनाव से पहले प्रियंका गांधी को सक्रिय राजनीति में उतारकर अपना ट्रंप कार्ड चला था है। उनके सहारे कांग्रेस प्रदेश में 2014 जैसे चुनावी माहौल चाहती है। जब भाजपा, भ्रष्टाचार, हिन्दुत्व और विकास के रथ पर बैठकर संसद में बहुमत तक पहुंची थी। इसी क्रम में कांग्रेस भी राफेल खरीद के मुद्दे को गरमाकर, सॉफ्ट हिन्दुत्व और गंगा मैया के सहारे अपनी चुनावी नैया को पार लगाने की कोशिश कर रही है। 

गौरतलब है कि प्रियंका गांधी अपनी तीन दिवसीय “ गंगा यात्रा” के लिए जलमार्ग से पूर्वांचल के चुनावी दौरे पर निकली हैं। उन्होने बड़े हनुमान मंदिर में दर्शन करने के बाद सोमवार को प्रयागराज से बनारस तक की “ गंगा यात्रा” की शुरुआत की, जिसमें वो आगे सड़क मार्ग से विंध्याचल के दर्शन करने के साथ कंतित शरीफ दरगाह में चादर चढ़ाकर फिर स्टीमर से बनारस के लिए निकाल जाएंगी। उत्तर प्रदेश में गंगा लोगों की आस्था और सामाजिक जीवन का एक अभिन्न अंग है। गंगा केवल एक नदी ही नहीं बल्कि एक परंपरा के साथ इसके किनारे बसने वालों के रोजगार का स्रोत भी है। इसके तट पर बसी आबादी का जातीय समीकरण भी दिलचस्प है।

यहाँ पर ब्राह्मण, निषाद , दलित, मल्लाह के साथ अन्य पिछड़ों की आबादी भी अधिक है। इसी कारण से पिछले लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बनारस सीट को चुना था। उन्होंने ये भी कहा था वो “यहाँ आयें नहीं है, गंगा मैया ने उन्हें बुलाया है”। इसी को ध्यान में रखते हुए बार प्रियंका गांधी भी सोची समझी योजना के तहत अपनी पार्टी की नाव को गंगा मैया के सहारे पार लगाने की हर संभव कोशिश में है। हालांकि सच्चाई ये है कि कांग्रेस की नजर इस चुनाव से ज्यादा आने वाले 2022 के चुनावों के चुनावों पर है। कांग्रेस उसी दिशा में धीरे- धीरे कदम बढ़ाती दिख रही है। प्रदेश में एकला चलो की रणनीति भी इसी बात का संकेत देती है। कांग्रेस अपनी राष्ट्रीय पार्टी की इमेज को ज्यादा धूमिल नहीं करना चाहती। कांग्रेस केंद्र में सही का साथ चाहती है लेकिन उसकी कोशिश हमेशा से यही रही है कि क्षेत्रीय पार्टियाँ ज्यादा मजबूत न हो पाये।

जैसा उत्तर प्रदेश में हुआ 1980 के बाद से जब से सपा और बसपा ने कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाकर बारी-बारी से प्रदेश में राज किया लेकिन कांग्रेस उसके बाद से आज तक वापसी नहीं कर पायी। कांग्रेस का अपना आंकलन है कि उसके साफ्ट हिंदुत्व से मुसलमान भी नाराज नहीं होंगे, क्योंकि मुसलमान, भाजपा से असहज उन्हें सॉफ्ट हिन्दुत्व से ज्यादा दिक्कत नहीं है। ये कहा जा सकता है कि प्रियंका कि इस तीन दिवसीय गंगा यात्रा को कांग्रेस ने “ सांची बात प्रियंका के साथ” का नाम दिया है। जिसमे प्रियंका महिलाओं और गैरयादव पिछड़ों के साथ सीधे संवाद कर रही है, वो लोगों के साथ कनेक्ट करने में भी सफल होती दिख रही है।

वो इस क्षेत्र के पिछड़ेपन का मुद्दा भी उठा रही है खासकर महिलाओं के साथ। कांग्रेस ने पूर्वआंचल निषादों के बड़े वोट बैंक को साधने के लिए गंगा यात्रा कारगर साबित हो सकती है। वहीं देश मे पिछड़ों के एक बड़े वर्ग कुर्मी को अपने साथ जोड़ने के लिए कांग्रेस ने हार्दिक पटेल को पहले ही अपने साथ कर कर लिया है।  इस लिहाज से कांग्रेस अपने चुनावी एजेंडे को धर्म और जाती से इतर दूसरे मुद्दों जैसे बेरोजगारी, गरीबी, व्यापार,भ्रष्टाचार, स्वास्थ्य और कृषि कि तरफ मोड़ने मे अगर सफल रहती है तभी उसका इस चुनाव में भला हो सकता है। क्योंकि जब जब कोई पार्टी धर्म और जातीय आधार पर चुनाव में भाजपा के खिलाफ उतरती है तो भाजपा उसे बड़ी आसानी से धुरुविकरण के द्वारा अगड़ी बनाम पिछड़ी और हिन्दू बनाम मुस्लिम बनाने में, पिछले कई चुनाव दर चुनाव सफल होती आयी है।

हालांकि इस बार भाजपा ने अपने राम मंदिर निर्माण मुद्दे को थोड़ा पीछे रखा हुआ है, क्योंकि इस बार भाजपा देशभर में सर्जिकल स्ट्राइक और पुलवामा आतंकी हमले के बाद हुई भारतीय जवाबी एयर स्ट्राइक को प्रमुखता से प्रचारित कर रही है। देश में पिछले एक महीने में बदले इस घटनाक्रम ने भाजपा को देशभक्ति रूपी टानिक दे दिया है, जिसके चलते इस चुनाव में उसे बढ़त मिलती दिख रही है। वहीं कांग्रेस के लिए सबसे अनुकूल राजनीतिक परिस्थिति वही है जहाँ उसका मुक़ाबला सीधे भाजपा जैसे राष्ट्रीय दल से हो तभी उसे सत्ता परिवर्तन का सुख मिलता है। जैसे कि राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, उत्तराखंड और मध्य प्रदेश में होता है। जहाँ भाजपा के हारने के बाद उन्हे सरकार में मौका मिलता है।

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