पश्चिम बंगाल की घटनाओं को देखते हुए प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर बहस की जरुरत

First Published 8, Feb 2019, 3:53 PM IST
Bureaucratic setup of India need a serious discussion
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पिछले दिनों पश्चिम बंगाल में जिस तरह से वरिष्ठ पुलिस अधिकारी वर्दी पहनकर मुख्यंमत्री के राजनीतिक धरने में शामिल हुए। उससे कई सवाल खड़े होते हैं। आज नौकरशाही अनेक तरह के गंभीर आरोपों में घिरी हुई है। उसपर राजनीतिक पक्षधरता के आरोप लगाए जा रहे हैं। आखिर क्यों तेज हो गया है यह सिलसिला। जानते हैं एक विश्लेषण के जरिए। 

आज की नौकरशाही और शुरुआती नौकरशाही में अंतर क्या है? पराधीनता के समय इस नौकरशाही का मुख्य उद्देश्य क्या था? उसका उद्देश्य था भारत में अँग्रेजी शासन को अक्षुण्ण रखना और उसे मजबूती प्रदान करना। जनता के हित, जरूरतें और अपेक्षाएं दूर-दूर तक उसके सरोकार नहीं थे। 

अंग्रेजी शासन के दौरान नौकरशाही के उच्च पदों पर जो अधिकारी थे उनमें अधिकांशत: अंग्रेज अफसर ही होते थे। भारतीय तो उसके मातहत अधिकारियों और कर्मचारियों के रूप में ही सरकारी सेवा में भर्ती किए जाते थे, जो पूरी ईमानदारी से अपने वरिष्ठ अंग्रेज अधिकारियों की जीहुजूरी करते थे। 

स्वतंत्रता के बाद भारत में अनेक लोकतांत्रिक बदलाव हुए लेकिन नौकरशाही को यथावत ही स्वीकार कर लिया गया। लिहाजा उसकी विरासत और उसका चरित्र पूर्ववत ही बना रहा। भले ही भारतीय सिविल सर्विस का नाम बदलकर भारतीय प्रशासनिक सेवा कर दिया गया और प्रशासनिक अधिकारियों को लोक सेवक कहा जाने लगा, लेकिन अपने चाल, चरित्र और स्वभाव में वह सेवा वैसी ही बनी रही। 

समय बदला तो कार्य-संस्कृति भी बदली, विकास और भ्रष्टाचार दोनों के स्वरूप भी बदले, नैतिकता और अनैतिकता के पैमाने भी बदले और आज हम जिस जगह और जिस समय में खड़े हैं यहाँ तक आते-आते पूरी नौकरशाही ही प्रश्नवाचक घेरे में आ गई। भारत में हर दिन कोई न कोई विकास की योजना बनती रही लेकिन उसका कितना हिस्सा जमीन पर पहुँचा, इसका कोई लेखा-जोखा नहीं है और न ही इसकी किसी तरह की जिम्मेदारी तय हो पायी है। आखिरकार नौकरशाही की जिम्मेदारी सुचारु क्रियान्वयन है या नहीं। 

भारत का स्वरूप स्वाधीनता के बाद अनेक क्षेत्रों में बहुत विस्तृत हुआ है लेकिन नौकरशाही का अपने अधिकारी होने का दंभ एक ओर और उसके भ्रष्टाचार दूसरी ओर। यह वर्ग खुद को आम भारतीयों से अलग, शासक और स्वामी भावना से भरा होता है। अपने अधिकारों और सुविधाओं के लिए यह वर्ग जितना सजग रहता है, आम जन के हितों, आवश्यकताओं और उनकी अपेक्षाओं के प्रति उतना ही गैरजिम्मेदार रहता है। 

कुछ साल पहले पॉलिटिकल एंड इकोनॉमिक रिस्क कंसल्टेंसी संस्था (पर्क) ने सर्वेक्षण कराया और रिपोर्ट प्रकाशित की। हांगकांग की इस संस्था ने उत्तरी और दक्षिण एशिया के 12 देशों में कामकाज के लिहाज से भारतीय नौकरशाहों को सबसे निचली पायदान पर पाया। भारत की नौकरशाही सर्वेक्षण में शामिल एशियाई देशों में कामकाज के लिहाज से सबसे निचले पायदान पर थी। इस सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि भारतीय नौकरशाह राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर खुद को सत्ता के केंद्र के रूप में समर्पित कर देते हैं। 

नेताओं की जिम्मेदारी और समय दोनों तय है। राजनेता तो कुछ ही समय के लिए सत्ता में आते हैं और जनता की अपेक्षाओं पर खरा न उतरने पर सत्ता से बाहर हो जाते हैं, लेकिन नौकरशाह तो 30-35 वर्षों की लंबी अवधि तक अनवरत रूप से सत्ता के केंद्र में ही बने रहते हैं और समूचे कार्यपालिका तंत्र की असली बागडोर अपने हाथों में लिए रहते हैं। 

सुप्रीम कोर्ट में भी इसको लेकर एक मामला पेंडिंग है। उसमें भी कहीं न कहीं यही चिंता है कि राजनीति और नौकरशाही के गठजोड़ पर प्रतिबंध लगाना चाहिए और नौकरशाहों की भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। वे नहीं समझते कि देश के विकास की तमाम नीतियों और कार्यक्रमों को तैयार करने तथा उन्हें कार्यान्वित करने में सबसे अहम भूमिका उन्हीं की है। 

लेकिन यदि भारत की आम जनता गणतंत्र के 70 वर्ष बीत जाने के बाद भी अपने को ठगा हुआ महसूस कर रही है और विकास की दिशा से अब तक वंचित है तो इसके लिए सर्वाधिक जिम्मेदार भारत के नौकरशाह ही हैं। 

इसलिए अब भारत की नौकरशाही पर गंभीर बहस की जरूरत है और यह होनी चाहिए। किसी जमाने में सरदार पटेल ने भारत की नौकरशाही को स्टील फ्रेम कहा था, लेकिन समय के साथ यह अवधारणा भी संदिग्ध होती गई। 

एक समय में भारतीय प्रशासनिक सेवा के तेजतर्रार अधिकारी टीएसआर सुब्रमण्यम ने लिखा है कि अब इस स्टील फ्रेम पर जंग लग गई है और इसे बदलना चाहिए। ध्यान रहे टीएसआर सुभ्रमण्यम की गणना भारत के चुनिन्दा अधिकारियों में होती है। 

आखिरकार बहस की आवश्यकता क्यों ?
पिछले 26 जनवरी को राष्ट्र ने 70वां गणतंत्र मनाया। ऐसे में हमें इन 70 सालों की खूबियों और खामियों पर विचार करना चाहिए और यही एक स्वस्थ और विकसित लोकतंत्र की पहचान है। यह समझना जरूरी है कि इस मुद्दे पर बहस की आवश्यकता क्यों है? 

पिछले कुछ दिनों में कुछ ऐसे मामले आए हैं जिनके मद्देनजर यह प्रश्न विचारणीय हो गया है। पिछले दिनों सीबीआई के उच्च पदाधिकारियों की जैसी नूराकुश्ती हुई और उसका जो हश्र हुआ, उसकी आड़ में भी कहीं न कहीं भ्रष्टाचार ही है। अच्छी बात यह है कि यह खुद ही सामने आ गया जिससे देश को भी अंदाजा लग गया, अन्यथा अनेक ऐसे मामले आपस में निपटा लिए जाते हैं या दबा दिये जाते हैं। 

वहीं पिछले दिनों उत्तर प्रदेश की बहुचर्चित आईएएस अधिकारी बी चंद्रकला के घर सीबीआई का छापा पड़ा। जिसमें उनके घर से सीबीआई ने बहुत कुछ प्राप्त करने की जानकारी दी, जिसका संबंध उत्तर प्रदेश में खनन घोटाले से बताया गया। बंगाल में पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार के घर जब सीबीआई गई तो पुलिस ने सीबीआई अधिकारियों को ही गिरफ्तार कर लिया। उसके बाद बंगाल सरकार खुद धरने पर आ गई और मामला सुप्रीम कोर्ट से निपटा। 

यह कोई पहला मामला नहीं है जब भ्रष्टाचार में बड़े अधिकारियों का नाम आया है। इससे पहले भी जितने भी बड़े-छोटे घोटाले हुए हैं उनमें किसी न किसी अधिकारी का नाम आया ही है, चाहे वह चारा घोटाला हो, बोफोर्स हो, टू जी हो, कोयला हो, नोएडा विकास प्राधिकरण हो, ताज कॉरिडोर हो या एक्स्प्रेस वे हो। विकास का कोई भी बड़ा अध्याय असंदिग्ध नहीं है और कोई भी ऐसा असंदिग्ध मामला नहीं है, जिसमें किसी नौकरशाह का नाम न आया हो। बी चंद्रकला के मामले में सुनने में आया है कि पिछले आठ-दस वर्षों की वैध कमाई उतनी है जितनी उस रैंक के दूसरे विभागों के अधिकारी पूरे जीवन में नहीं बचा पाते। 

कुछ दिन पहले एक समाचार चैनल ने एक स्टिंग आपरेशन किया था जिसमें उत्तर प्रदेश की वर्तमान सरकार के तीन मंत्रियों के सचिवों को भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा हुआ पाया। यदि इससे पहले के उत्तर प्रदेश के पुराने घोटालों की बात की जाय तो नीरा यादव, यादव सिंह आदि का नाम बहुचर्चित रहा है। यह किसी एक प्रदेश की बात नहीं है, पूरे देश में ऐसे अनेक मामले रहे हैं और हैं भी।  

जब संविधान में संसोधन हो सकता है तो इसमें क्यों नहीं       
ऐसे कई अवसर आए हैं जब नौकरशाही पर दाग लगा है और आम जनमानस की ओर से इस तरह की आवाज उठायी गई है कि इस पर बहस की जाय लेकिन ये आवाजें कहीं न कहीं दब जाती हैं या दबा दी जाती हैं। ऐसा कौन सा डर है कि इस पर अभी तक कोई गंभीर बहस नहीं हो रही है। भारत की नौकरशाही भारत के संविधान से बड़ी नहीं है। 

भारत की आस्था संविधान के प्रति है और नौकरशाही भी संविधान के दायरे में ही आती है। आवश्यकता के अनुरूप संविधान में संशोधन हो जाता है फिर नौकरशाही पर बहस क्यों नहीं हो रही है। वर्तमान सरकार ने विभिन्न मंत्रालयों में उच्च पदों को भरने के लिए विज्ञापन निकाला था लेकिन वह भी कहीं खो सा गया। यह विज्ञापन जब आया था तो एक बड़े तबके में इसे लेकर खलबली मची थी, क्योंकि यह एक सकारात्मक कदम था।

अब इस पर गंभीर बहस की जरूरत महसूस की जा रही है। देश का एक बड़ा हिस्सा आज भी विकास की वास्तविकता से बहुत दूर है। इस बहस के माध्यम से नए रास्ते और नए सुधार की ओर बढ़ना देशाहित में आवश्यक है। देश में जिस तरह की सामाजिक और राजनैतिक स्थिति बन रही है उसमें यह बहस देश को नई दिशा दे सकती है। पुराने मानकों से आगे निकलकर नई उम्मीदों और नई सामाजिक वैचारिक बहसों से एक सकारात्मक राह निकाली जा सकती है। नौकरशाही में सुधार और संशोधन देश के विकास के लिए नये मार्ग खोल सकते हैं।  

संतोष कुमार राय
लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व असिस्टेंट प्रोफेसर और गांधी शांति संस्थान के सदस्य हैं।  

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