सर्फ़ एक्सेल विज्ञापन विवाद — हिंदुस्तान यूनिलीवर को धंधा करना नहीं आता

First Published 12, Mar 2019, 10:36 AM IST
surf excel advertisement controversy hindustan lever does not know business
Highlights

अगर हिंदुस्तान यूनिलीवर कोई फ़िल्म कंपनी होती तो हो सकता है विज्ञापन से उठे विवाद से उसे बॉक्स ऑफिस में फायदा होता, पर विवादास्पद विज्ञापन बनाकर कभी खुदरा व्यापार की वस्तुओं की बिक्री में तेज़ी नहीं आती। बल्कि गलाकाट प्रतिस्पर्धा के युग में टक्कर की कंपनी आगे निकल जाती है।

अगर हिंदुस्तान यूनीलीवर कोई फ़िल्म प्रोडक्शन हाउस होता तो आज 'सर्फ़ एक्सेल' के विज्ञापन पर मचे इस वितंडे से उसकी फ़िल्म को बॉक्स ऑफिस पर फ़ायदा हो सकता था। लेकिन दुर्भाग्य से वह कोई फ़िल्म प्रोडक्शन हाउस न हो कर उपभोक्ता केंद्रित उत्पादों या 'consumer goods' का निर्माण करने वाला एक विशुद्ध खुदरा व्यापार समूह है और खुदरा व्यापार की संवेदनशील प्रकृति उसे हर वितंडे से नुक़सान ही पहुँचाने की नीयत रखती है।

सर्फ़ एक्सेल का वह विज्ञापन कैसा है और उसके निहितार्थ क्या हैं यह बेहद वस्तुनिष्ठ विषय है जिस पर हर इंसान की अलग-अलग राय होगी, लेकिन मेरी दिलचस्पी उससे उपजे इस विवाद के व्यापारिक परिणामों को समझने में है।

मुझे विज्ञापनों के समाजशास्त्रीय या राजनैतिक महत्व की अधिक समझ नहीं है, लेकिन अगर धंधे को लेकर मेरी समझ थोड़ी भी सही है तो किन्हीं भी कारणों से अपने विज्ञापनों के चलते बीते कुछ समय में जितना नुक़सान एक ब्रैंड के रूप में हिंदुस्तान यूनीलीवर को हुआ है, वह सबसे अधिक उनके और उनकी एजेंसी लोव लिंटास के बीच के रिश्तों को प्रभावित करेगा। धंधे की ज़बान में कहें तो यह अपनी ही दुकान के इश्तेहार पर पैसे देकर कालिख़ पुतवाने जैसा है क्योंकि इतनी गलाकाट प्रतिस्पर्धा के समय में अगर बाज़ार का एक छोटा सा हिस्सा भी आपके विज्ञापनों के कारण आपके ख़िलाफ़ हो जाता है तो यह एक तरह से अपनी ही तबाही के लिए किसी को किराए पर रखने की तरह है।

जब आपको एक फ़िल्म बना कर थिएटर्स में प्रदर्शित करनी होती है तब आपके लिए विवाद इसलिए लाभदायक साबित हो सकते हैं (हालाँकि हमेशा ऐसा भी नहीं होता) कि फ़िल्म एक बार इस्तेमाल किए जाने लायक उत्पाद (one time consumable product) होती है जिसके बारे में दर्शकों को सब कुछ पहले से नहीं बताया जाता है, और उससे जुड़ा वह सस्पेंस ही उसे बेचने के लिए सबसे बड़ी ताक़त के रूप में काम करता है। ऐसे में फ़िल्म की रिलीज़ से पहले उसे लेकर हुआ हर विवाद आम जनता में उसके प्रति जिज्ञासा या कौतूहल को बढ़ाता है, जिसकी वजह से उसके रिलीज़ होने के बाद बहुत से लोग तो सिर्फ़ उसमें उन्हीं अंशों अथवा दृश्यों को देखने जाते हैं जिनके कारण वह विवादों में घिरी थी। फ़िल्मों की शेल्फ़ लाइफ़ चूँकि अब इतनी कम हो चुकी है कि एक-दो हफ़्ते के बाद किसी को शायद ही उसे थिएटर्स में जारी रखने में दिलचस्पी हो, इसलिए अधिकतर मौक़ों पर यह रणनीति प्रोडक्शन हाउस के हक़ में काम कर जाती है।

लेकिन खुदरा व्यापार या रिटेल बिज़नेस का स्ट्रक्चर इसके ठीक उलट है। यहाँ आप सालों में मज़बूत हुई ब्रैंड वैल्यू के सहारे बाज़ार में अपने हिस्से का विस्तार करते रहने के लिए हर पल पुरज़ोर कोशिश में लगे रहते हैं, और आपके हर नए विज्ञापन कैम्पेन का उद्देश्य आपकी उसी ब्रैंड वैल्यू में और ज़्यादा अभिवृद्धि करना ही होता है।

लेकिन यहाँ एक और पेंच है। विज्ञापन जगत में बड़ी-बड़ी एजेंसियों की ऐसी ज़बरदस्त पकड़ है कि लगभग हर बड़ा व्यापार समूह किसी न किसी बड़ी विज्ञापन एजेंसी का पक्का ग्राहक होता है। किसी आम इंसान को यह सुन कर हैरत हो सकती है कि एक-एक विशाल व्यापार समूह का सालाना विज्ञापन ठेका, जिसे व्यापारिक भाषा में 'ब्रैंडिंग अकाउंट' या सिर्फ़ 'अकाउंट' भी कहते हैं, 50-60 करोड़ तक या उससे भी अधिक रक़म में किसी एजेंसी को मिलता है। यहाँ पर, इन बड़ी एजेंसियों के मन में अपनी ख़ुद की ब्रैंडिंग भी 'अलग' और 'हट के' विज्ञापन बनाने वाली एजेंसी के रूप में स्थापित करने की इच्छा ज़ोर मारने लगती है, और कभी 'झटका देने' वाले विज्ञापन तो कभी 'सामाजिक कल्याण' से जुड़े विज्ञापन रच कर वे इस तरफ़ बढ़ने की कोशिश भी करते हैं।

मेरा ख़याल है कि शायद 'सर्फ़ एक्सेल' के उस विज्ञापन का कॉन्सेप्ट डिज़ाइन करते वक़्त भी लोव लिंटास की क्रिएटिव टीम कुछ ऐसा ही बड़ा कैम्पेन तैयार करने की सोच रही होगी जो उसके क्लाइंट यानि हिंदुस्तान यूनीलीवर को एक ब्रैंड के तौर पर और अधिक मज़बूती तो दे ही, साथ ही किसी न किसी अंतर्राष्ट्रीय विज्ञापन पुरस्कार उत्सव में उनकी एजेंसी को भी कोई बड़ा इनाम दिलवा दे। अक्सर ऐसी उत्तेजना में आकर क्रिएटिव टीम के लोग अपनी कोशिशों में थोड़ी दूर चले जाते हैं। लेकिन कई बार ऐसी कोशिशों में आप कुछ ऐसा कर बैठते हैं जो बाज़ार के किसी न किसी हिस्से को नागवार गुज़रता है।

अब मीडिया संस्थानों की टीवी स्क्रीन पर चमकते डिबेट पैनल्स, अख़बारों के संपादकीय पन्ने भरते वरिष्ठ पत्रकार और सारी दुनिया को समझने-समझाने के पुनीत कर्तव्य पर अपना इकलौता दावा रखने वाले बुद्धिजीवियों के जत्थे चाहें तो बाज़ार के उस हिस्से की राजनैतिक/समाजशास्त्रीय/मनोवैज्ञानिक व्याख्याएँ करने में टनों कागज़, हज़ारों मिनट का एयरटाइम या अरबों गीगाबाइट डेटा फूँक सकते हैं, लेकिन बाज़ार का निर्मम सच यही है कि खुदरा व्यापार में लंबे अरसे से सक्रिय किसी भी ब्रैंड के लिए यह हो जाना सर्वाधिक भयावह दुःस्वप्नों में से एक के सिवा और कुछ नहीं हो सकता है। जी हाँ, 'सर्फ़ एक्सेल' के होली वाले विज्ञापन को लेकर जाने-अनजाने जो कुछ भी हुआ है, वह न सिर्फ़ हिंदुस्तान यूनीलीवर और लोव लिंटास के रिश्तों को, बल्कि उनकी मार्केटिंग टीम के ढाँचे को भी गहरे तक प्रभावित करेगा। भले ही इसकी ख़बरें बिज़नेस मीडिया के शुष्क और नीरस दायरे से बाहर आम जनता तक कभी न आएँ, लेकिन हिंदुस्तान यूनीलीवर की मार्केटिंग टीम और लोव लिंटास की क्रिएटिव टीम में कुछ छँटनियाँ आने वाले कुछ हफ़्तों में ज़रूर की जाएँगी। और वह इसलिए, क्यूँकि धंधे का पहला नियम यही है कि इसे चलने के लिए विवाद नहीं चाहिए; और दूसरा नियम यह है कि जिसकी वजह से विवाद हुआ हो, धंधा उसे बड़ी बेरहमी से अपनी हदों से बाहर कर देता है।

स्तंभकार फ़िल्म जगत में बहैसियत संपादक काम करते हैं। लेख में छपी राय उनकी निजी है।

loader