
कोलकाता. शौर्य चक्र से सम्मानित रिटायर्ड कर्नल शंकर वेम्बू बचपन से ही भारतीय सेना में जाने की इच्छा रखते थे। उनकी ये इच्छा पूरी हुई लेकिन सेना में 20 साल गुजारने के बाद उन्होंने वॉलंटरी रिटायरमेंट ले लिया ताकि शहीदों के उन परिवारों तक मदद पहुंचा सके जिनकी मौत के बाद लोग उनके परिवारों को भूल जाते हैं।
उग्रवादियों को भगाने के लिए मिला शौर्य चक्र
वेम्बू शंकर 3 दिसंबर 1975 को कोलकाता में पैदा हुए, उनकी शुरुआती जिंदगी मद्रास में गुजरी। उन्होंने पीएस सीनियर सेकेंडरी स्कूल से पढ़ाई किया फिर नेशनल डिफेंस एकेडमी और इंडियन मिलिट्री एकेडमी चले गए। 1997 में उन्हें भारतीय सेना में कमीशन किया गया थ फिर 1998 में डोगरा स्काउट के साथ जुड़ाव के दौरान जम्मू कश्मीर के कुपवाड़ा में उग्रवादियों को हटाने के लिए उनकी बहादुरी और साहस के लिए शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया। 1999 में वेम्बू शंकर कारगिल युद्ध का भी हिस्सा रहे।
बीस साल नौकरी के बाद लिया वीआरएस
कर्नल शंकर ने सेना में 20 साल नौकरी की और फिर रिटायरमेंट ले लिया। इस रिटायरमेंट के पीछे भी एक बड़ी वजह थी कर्नल शंकर के अनुसार युद्ध में शहीद होने वाले सैनिक और अफसरों के मरने के बाद इनके घर वाले सेना से मिलने वाली सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं। इनके परिवार के लोग कैसे अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं कुछ पता नहीं चलता ऐसे ही लोगों की सेवा के लिए शंकर ने वीआरएस ले लिया।
शहीदों के परिजनों को मदद पहुंचाने की मुहीम शुरू की
इस मुहिम का नाम उन्होंने प्रोजेक्ट संबंध रखा था । रिटायरमेंट से पहले ही साल 2017 में इस प्रोजेक्ट की शुरुआत हो गई थी जिसमें कर्नल शंकर शहीद हुए सैनिकों के परिवारों से जाकर मुलाकात कर रहे थे । हजार दिन के प्रोजेक्ट में कर्नल शंकर ने शहीद हुए सैनिकों के परिवारों से मुलाकात करके उन तक मदद पहुंचा रहे थे। हालांकि यह मुश्किल था सैनिकों के परिवार का पता करना फिर उनको वेरीफाई करना और फिर यह तय करना कि उन तक मदद पहुंच रही है या नहीं। 27000 ऐसे परिवारों को कर्नल शंकर ने ढूंढ निकाला। इस योजना का मुख्य उद्देश्य ही था शहीद के परिजनों के सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में जागरूकता लाना । उन्हें भारतीय सेवा के निदेशालय से जोड़ने में सहायता करना। शहीद हुए सैनिक के बच्चे, उनकी मांओं, विधवाओं को एजुकेशन और सामाजिक योजनाओं के बारे सुविधा प्रदान करना।
शहीद की विधवा और बेटे को ढूंढ निकाला कर्नल ने
अपने इस प्रोजेक्ट के संबंध में कर्नल शंकर ने फेसबुक पर एक पोस्ट भी लिखा कि वह शहीद सैनिक (हवलदार के पोमुंदी) के घर गए। वहां शहीद के भाई से मिले जिसने बताया कि शहीद की पत्नी और बेटे को किसी भी प्रकार की सुविधा की जरूरत नहीं है। कर्नल शंकर इस बात से हैरत में थे कि आखिर क्यों पत्नी और बेटे को सुविधा नहीं चाहिए। उन्होंने शहीद की पत्नी और बेटे का पता लगाया तो पता चला कि आर्थिक तंगी के चलते विधवा और उसके बेटे ने बहुत संघर्ष किया। सारे कागजात होने के बावजूद शहीद (के.पोमुंदी) के बेटे ने किसी एजुकेशनल स्कॉलरशिप के लिए अप्लाई नहीं किया। शंकर ने उन्हें सारी स्कीम समझाई और उनका फॉर्म भी भर दिया।
ये हैं सैनिको के परिवारों के लिए स्कीम
शहीदों के परिवार के लिए ज्यादातर स्कीम एजुकेशन पर है। इनके बच्चों को स्कॉलरशिप मिलती है क्लास एक से आठ तक दस हज़ार रुपये मिलते हैं 9 से 12वीं क्लास तक हर साल चौदह हज़ार रुपये मिलते हैं। ग्रेजुएशन करने वाले को बीस हज़ार मिलते हैं पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए बीस हज़ार मिलते हैं और प्रोफेशनल कोर्स के लिए सालाना पचास हज़ार मिलते हैं। अगर किसी सैनिक की विधवा फिर से शादी करती है तो उसको एक लाख मिलते हैं। यह सारे पैसे बहुत आसानी से मिलते हैं लेकिन इसकी जानकारी होना जरूरी है।
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