
हरयाणा. कारगिल युद्ध में दुश्मनों के दांत खट्टे करने वाले बहुत सारे योद्धा हमारे बीच आज भी हैं। उनमें एक हैं हरियाणा के दीपचंद सिंह, जिन्होंने पाकिस्तान की सेना को हराने में अहम भूमिका निभाई थी। इस जीत को हासिल करने में दीपचंद ने अपने दोनों पैर और एक हाथ खो दिए। माय नेशन हिंदी से दीपचंद की खास बातचीत।
दीपचंद को 17 बोतल खून चढ़ाना पड़ा
कारगिल के युद्ध में दीपचंद मिसाइल रेजीमेंट का हिस्सा थे। वह 1889 मिसाइल रेजिमेंट में गनर के रूप में भर्ती हुए थे। उस वक्त जम्मू कश्मीर में आतंकवादी पैर पसार रहे थे। दीपचंद ने मुठभेड़ में 8 आतंकवादियों को मौत के घाट उतार दिया और उसके बाद उनकी तैनाती 1999 में कारगिल युद्ध में टाइगर हिल की 17000 फीट की ऊंचाई पर कर दिया गया। इस इलाके में ऐसी ठंड होती है कि सांस लेने में भी मुश्किल होती है। कारगिल युद्ध के समय ऑपरेशन विजय में तोलोलिंग के ऊपर सबसे पहला गोल दागने वाले जवान दीपचंद थे। इस दौरान तोप का गोला फटने से दीपचंद बुरी तरह जख्मी हो गए। जिस्म से इतना खून बहा की उनको बचाने के लिए 17 बोतल खून चढ़ाया गया। डॉक्टर ने उनकी दोनों टांगें और एक हाथ काट दिया। दीपचंद के दोनों पैर प्रोस्थेटिक हैं लेकिन उनका जज्बा आज भी उतना ही मजबूत है।
कारगिल युद्ध में पहला गोला दीपचंद की गन से निकला
दीपचंद कहते हैं जब मेरी बटालियन को युद्ध के लिए आगे बढ़ने का आर्डर मिला तो पहले ही राउंड में गोला मेरी गन चार्ली 2 से निकला था। पहले गोले ने अपना काम कर दिया था। हमारी बटालियन ने दस हज़ार राउंड फायर किया। अपने कंधे पर गन उठा कर ले जाते थे। ऐसा करने में हमने 8 जगह गन पोजीशन चेंज किया। हमारी बटालियन को 12 गैलंट्री अवॉर्ड मिला। जब हम जंग लड़ रहे थे, उस वक्त हमारा सिर्फ एक ही लक्ष्य था दुश्मन का खात्मा। हमने अफसर से कह दिया था- खाना पानी मिले या ना मिले गोला बारूद कम नहीं होना चाहिए।
अगले जनम मोहे सैनिक ही कीजो
दीपचंद आज भी जब सैल्यूट करते हैं, तो दाहिनी हाथ से करते हैं। जो युद्ध के दौरान कट गया था। वह कहते हैं- यह हाथ तिरंगा देखते ही खुद ब खुद उठ जाता है। दीपचंद ने अपने कई दोस्तों को इस जंग में खो दिया। अपने दोस्त मुकेश के बारे में वह बताते हैं कि गोलीबारी के दौरान मुकेश ने मेरे हाथों में अपनी आखिरी सांस ली थी। हमने एक दूसरे से वादा किया था, कि जो भी साथी युद्ध में बचेगा वह दूसरे के परिवार वालों से जरूर मिलेगा और मैंने वही किया। मैं अपने शहीद हुए साथियों के परिवार वालों से मिला। वह कहते हैं शारीरिक नुकसान की वजह से भारतीय सेवा में लंबे समय तक नहीं रह पाया लेकिन भगवान से यही प्रार्थना करता हूं "अगले जनम मोहे सैनिक ही कीजो"
हाथ पैर कटने की बात पत्नी से छुपाई
दीपचंद कहते हैं- सैनिक का परिवार हमेशा अलर्ट पर रहता है कि कब कहां से क्या खबर आ जाए। वो हर पल सरहद पर तैनात अपने पति, भाई, पिता को लेकर एक दहशत में जीते हैं। दीपचंद कहते हैं- जब मेरा पैर और एक हाथ कटा तो बहुत दिनों तक मैंने अपनी पत्नी को इसलिए नहीं बताया कि उसको दुख होगा,लेकिन कितने दिन छुपाता। एक दिन उसको पता चल ही गया। शरीर के तीन हिस्से खोने का गम उस वक्त होता, जब हम जंग ना जीत पाते लेकिन हमारी बटालियन विजेता थी। मुझे इस बात का कोई गम नहीं है। चाहे कृत्रिम पैर ही सही, चल तो रहा हूं। ना इस लायक हूं कि अपने बाज़ू से तिरंगे को सलामी दे सकता हूं।
दीपचंद को मिला कारगिल योद्धा का सम्मान
दीपचंद को फार्मर सीडीएस जनरल बिपिन रावत ने कारगिल विजय दिवस के दौरान कारगिल युद्ध की उपाधि से सम्मानित किया था। फिलहाल दीपचंद आदर्श सैनिक फाउंडेशन के जरिए ड्यूटी के दौरान दिव्यांग हुए सैनिकों की सेवा का काम कर रहे हैं।
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