
लखनऊ। महान पर्यावरण-चिन्तक एवं चिपको आन्दोलन के प्रमुख नेता सुंदर लाल बहुगुणा से एक मुलाकात ने पेशे से टीचर नंद किशोर वर्मा का जीवन बदल दिया। दिन में एक प्रतिष्ठित निजी स्कूल में पढ़ाते रहें। पर शाम को घर पर चलने वाली कोचिंग क्लास बंद कर दी। बहुगुणा के व्यक्तित्व से वर्मा इतने प्रभावित हुए कि अब वह 'जलदूत' के रूप में समाज में अनोखा किरदार निभा रहे हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के 70 अवार्ड्स प्राप्त कर चुके हैं। यूनाइटेड नेशन द्वारा भी उन्हें सम्मानित किया जा चुका है।
सुंदर लाल बहुगुणा से मुलाकात के बाद शुरु हुआ 'जलदूत' का सफर
माई नेशन हिंदी से बात करते हुए नंद किशोर वर्मा कहते हैं कि बहुगुणा जी की एक आदत थी कि वह ऐसे अनाज या फल नहीं खाते थे। जिनके उपज में ज्यादा पानी का इस्तेमाल होता था। उनकी यही आदत दिल को छू गई। लगा कि एक बंदा पर्यावरण को लेकर ऐसा चिंतन करता है तो इस क्षेत्र में कुछ काम करना चाहिए। बस, वहीं से जलदूत की यात्रा शुरु हो गई। बहुगुणा से वर्मा की मुलाकात एक पुस्तक मेले में हुई थी।
2009 से की नंद किशोर वर्मा ने शुरुआत
नंद किशोर वर्मा ने साल 2009 में जल-नदी संरक्षण और पौधारोपण के लिए काम करना शुरु कर दिया। लोगों को जागरुक करने से पहले परिवर्तन की शुरुआत भी खुद से ही की। साबुन से नहाना छोड़ दिया। खाने-पीने के लिए ज्यादा बर्तनों का इस्तेमाल बंद किया। ताकि पानी की बर्बादी कम से कम हो। फिर, भूगर्म जल के अंधाधुंध दोहन और बढ़ते जल प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए लोगों को जागरुक करना शुरु कर दिया। भूगर्भ जल और सतही जल (तालाब, पोखरों, नदियों) पर स्टडी शुरु कर दी।
कोचिंग बंद करने के बाद झेलें तीखे रिएक्शन
नंद किशोर वर्मा ने सबसे बड़ा कदम कोचिंग क्लास क्लास बंद कर उठाया था। नतीजतन, परिवार-दोस्तों की तीखी प्रतिक्रिया भी झेलनी पड़ी। लोग कहने लगे कि कोचिंग से अच्छी-खासी आय हो रही थी। उसे छोड़ दिया और अब ये बेवकूफी के काम कर रहे हो। उसमें 5-10 हजार अलग से खर्च कर रहे हो, तुम्हारे कहने से कौन पानी बचाएगा या वृक्षारोपण करेगा? बहरहाल, लोगों के रिएक्शन सुनने के बाद भी वर्मा आगे बढ़ते रहें।
2010 में उत्तराखंड प्रशासन अकादमी से ट्रेनिंग
कहते हैं कि यदि किसी चीज को शिद्दत से चाहो तो कायनात भी मदद करने लग जाती है। नंद किशोर वर्मा के साथ भी यही हुआ। उन्हें जल संरक्षण की दिशा में काम करने के लिए प्रशिक्षण की आवश्यकता महसूस हो रही थी। इसी सिलसिले में उन्होंने उत्तराखंड प्रशासन अकादमी को पत्र भी लिखा था, जो मंजूर हो गया और साल 2010 में नैनीताल में ट्रेनिंग ली। फिर वह रूके नहीं, लगातार स्कूलों में वर्कशॉप के जरिए बच्चों को जल संरक्षण के लिए जागरुक करते रहें। साथ-साथ जल संरक्षण के लिए काम कर रही देश की जानी-मानी संस्थाओं से प्रशिक्षण लेते रहें और लोगों को जागरुक करते रहें।
हजारों किमी की मोटरसाइकिल यात्रा, लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज
नंद किशोर वर्मा यहीं नहीं रूकें। साल 2010 की गर्मी की छुट्टियों में नदियों-झीलों के पौराणिक और मौजूदा स्थिति का आंकलन करने के लिए मोटरसाइकिल यात्रा शुरु कर दी। साल 2014, 2016 और 2020 तक उन्होंने 10 प्रदेशों की हजारों किलोमीटर की मोटरसाइकिल यात्रा कर लोगों को जागरुक किया। सार्वजनिक स्थानों पर नुक्कड़ सभाएं कर लोगों को जागरुक करते रहें। लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में उनका नाम दर्ज हुआ।
नंद किशोर वर्मा ने लिखीं 108 नदियों की कथाएं
वर्मा कहते हैं कि नदियों के किनारे कौन से शहर बसे हैं? उनका क्या महत्व है? इस बारे में जानकारी कर 108 नदियों की कथाएं लिखीं। गंगा और यमुना नदी के बारे में सब लोग जानते हैं पर क्षेत्रीय स्तर पर कई ऐसी नदिया हैं, जिनका महत्व सिर्फ क्षेत्रीय लोग ही जानते हैं। लगभग एक हजार नुक्कड़ सभाएं की। करीबन 10 हजार पौधरोपण हुआ।
जागरुकता के लिए लिखे 'जलदूत' के दोहे
नंद किशोर वर्मा कहते हैं कि बड़ा भाषण कोई सुनने को तैयार नहीं होता है। दोहे कम शब्दों में बड़ा संदेश देते हैं। वर्षों तक लोगों को जागरुक करने के दौरान यह बात समझ में आई तो पर्यावरण और जल संरक्षण से जुड़े जलदूत के दोहे लिखे।
नंद किशोर वर्मा को 'नेशनल वॉटर हीरो' सम्मान भी
केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने साल 2021 में नंद किशोर वर्मा को 'नेशनल वॉटर हीरो' के सम्मान से नवाजा। वर्तमान में जिला गंगा समिति, लखनऊ की प्रशासनिक कमेटी में नदी विशेषज्ञ के रूप में भी जुड़े हैं। आज भी वह बरसात के दिनों को छोड़कर हर रविवार स्थानीय गोमती नदी की सफाई में बिताते हैं।
6 से 7 राज्यों में काम कर रही टीम
नंद किशारे वर्मा कहते हैं कि मौजूदा समय में बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र, हरियाणा समेत छह से सात प्रदेशों में टीम काम कर रही है। यह टीम नदियों, जल स्रोतों और जल प्रदूषण को लेकर लोगों को जागरुक तो करती ही है, साथ ही पर्यावरण सरंक्षण में भी अहम भूमिका निभा रही है।
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