
नयी दिल्ली। 10वीं क्लास में पिता गुजर गए। तब महाराष्ट्र के समाधान गलांडे की उम्र महज 15 साल थी। आंखों में भविष्य के सपने ओर सामने परिवार की जिम्मेदारी। पढ़ाई जारी रखना भी मुश्किल था, क्योंकि 6 भाई बहनों के परिवार में पिता ही अकेले कमाने वाले थे। ऐसी परिस्थिति में मां ने जिम्मेदारी संभाली और बेटे से दो टूक बोलीं कि तुम्हें आगे पढ़ना है। बोर्ड एग्जाम में महज 2 महीने शेष थे। सेहत ठीक न होने के बावजूद भी मां ने खेती का काम संभाला।
पैसों की कमी से विज्ञान विषय से नहीं कर सकें 12वीं की पढ़ाई
दरअसल, समाधान गलांडे महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त इलाके मराठवाड़ा के रहने वाले हैं। दिहाड़ी मजदूरी और खेती के अलावा परिवार के पास रोजी-रोटी का कोई जरिया नहीं था। 10वीं में 81 फीसदी नंबर हासिल किए। 12वीं की पढ़ाई विज्ञान विषय में करने का मन था। पर उसके लिए लातूर जाना पड़ता। मां इतने पैसे नहीं कमाती थी कि बेटे को वहां पढ़ाई के लिए भेज सके। उन्होंने बेटे से कहा कि ऐसा कर, जो हमारी हद में हो। परिवार की माली हालत देखते हुए समाधान ने अपने नजदीकी बारसी के एक स्कूल में एडमिशन ले लिया। मां उन्हें हर महीने खर्चों के लिए लगभग 1500 रुपए भेजती थीं।
पैसे नहीं थे तो बारसी से लौटें, बीड में 12वीं में एडमिशन
मराठवाड़ा जैसे इलाके में समाधान की मां के लिए खेती और दिहाड़ी मजदूरी करके पैसे जुटाना भी मुश्किल हो रहा था। रिपोर्ट के मुताबिक, समाधान को कुछ समय तक पैसे नहीं मिल सकें। मां ने उधार मांग कर बेटे को पैसे भेजने की कोशिश की। पर कहीं से सहायता नहीं मिली। फिर समाधान ने तय किया कि वह 12वीं की पढ़ाई के बाद गांव लौटकर काम में अपनी मां का हाथ बटाएंगे। आखिरकार उन्हें गांव लौटना पडा और बीड में 12वीं क्लास के लिए एडमिशन लिया।
पैसों की कमी की वजह से फार्मेसी कोर्स में दाखिला नहीं
समाधान ने पढ़ाई के दौरान ही मां की मदद करना शुरू कर दिया। लोगों के ताने भी सुने की लड़का भटक गया है। ऐसी मुश्किलों के बीच समाधान ने 12वीं में 72 फीसदी नंबर हासिल किए। कॉमन एंट्रेंस टेस्ट के जरिए फार्मेसी कोर्स के लिए सेलेक्शन हो गया। कोर्स की फीस बहुत ज्यादा होने की वजह से दाखिला नहीं लिया। फिर सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के लिए पुणे में ग्रेजुएशन के लिए फर्ग्यूसन कॉलेज में एडमिशन लिया। उनकी अंग्रेजी इतनी कमजोर थी कि पहले ही साल में कुछ सब्जेक्ट में फेल हो गए और घर लौटने का फैसला किया। ऐसे में दोस्तों ने उनकी मदद की।
मां की तबियत बिगड़ी तो दोस्तों ने की आर्थिक मदद
दोस्तों के समझाने पर समाधान ने कोशिश की और धीरे-धीरे अपनी अंग्रेजी सुधारी, विषयों को समझने लगे। ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई शुरू की। उसी दरम्यान मां की तबीयत बिगड़ गई तो फिर वह पढ़ाई छोड़कर घर लौटने के बारे में सोच रहे थे। पर दोस्तों ने आर्थिक मदद की ।
अशोका विश्वविद्यालय से ₹14 लाख की फेलोशिप
आखिरकार समाधान की मेहनत रंग लाई। उन्होंने अशोका विश्वविद्यालय के एक साल के फेलोशिप प्रोग्राम के लिए आवेदन किया और ₹14 लाख की यंग इंडियन फेलोशिप प्राप्त की। यही उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। समाधान की कहानी उन लोगों के लिए प्रेरणा है, जो हालात के कारण हार मान लेते हैं। उन्होंने साबित किया कि मजबूत इच्छाशक्ति से कोई भी मंजिल प्राप्त की जा सकती है।
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