
लखनऊ. अमित सक्सेना जिन्हे लखनऊ का पैडमैन भी कहा जाता है, जब लोग मेंस्ट्रुअल हाइजीन पर खुल कर बात नहीं कर पाते थे, उस वक़्त अमित सक्सेना अपने झोले में हर रोज़ सैनिटरी पैड लेकर घर से निकलते थे और लखनऊ के आस पास के गाँव और स्लम एरिया की महिलाओं को जाकर बांटते थे। आज अमित कम से कम 60 हज़ार महिलाओं को माहवारी के प्रति जागरूक कर चुके हैं, वहीँ अमित ने एक ऐसा सैनिटरी पैड बनाया है जिस पर किसी महिला की नही बल्कि पुरुष की तस्वीर बनी हुई है।
समाजिक कार्य के लिए छोड़ दिया प्रिंसिपल की नौकरी
अमित का जन्म कन्नौज में हुआ था उनके पिता रविंद्र नारायण सक्सेना आगरा मैनपुरी यूनिवर्सिटी में एचओडी थे, अमित अपने माता-पिता की इकलौती संतान हैं, अमित ने भी सोशलॉजी में पीएचडी किया और 7 साल तक 2003 से 2010 तक एक डिग्री कॉलेज में बतौर प्रधानाध्यापक नौकरी किया, नौकरी से अमित को संतुष्टि नही मिली , लिहाज़ा 2010 में नौकरी छोड़ा और अपने एनजीओ सृजन फाउंडेशन के जरिए सामाजिक कार्य करना शुरू कर दिया, अमित ने अपना एनजीओ साल 2005 में बनाया था लेकिन नौकरी की वजह से एनजीओ में समय नहीं दे पा रहे थे नौकरी छोड़ने के बाद वह पूरी तरह से अपने एनजीओ के जरिए जरूरतमंद लोगों की मदद करने में तन मन धन से लग गए। इस दौरान माता-पिता की तबीयत खराब रहने लगी जिसके बाद अमित साल 2014 में लखनऊ आकर सेटल हो गए। 2015 में उन्होंने हिम्मत प्रोजेक्ट की शुरुआत किया जिसमें मेंस्ट्रूअल हाइजीन के प्रति लोगों को जागरूक किया जाने लगा।
माहवारी का नाम सुनते ही भाग गई लड़कियां
अमित कहते हैं साल 2015 में जब हिम्मत अभियान के तहत हम स्लम एरिया में लड़कियों को जागरूक करने पहुंचे तो लड़कियां इकट्ठा तो हुई लेकिन जैसे ही उन्हें पता चला कि यहां पर माहवारी के बारे में चर्चा होने वाली है वह यह कह कर चली गई कि "अभी अपनी सहेलियों को बुला कर लाते हैं" यह बहाना करके लड़कियां भाग गई, शुरू में 20 महिलाओं को भी इकट्ठा करना मुश्किल होता था क्योंकि महामारी का नाम सुनते ही उन्हें शर्म आती थी और वह ऐसे किसी विमर्श में बैठना नहीं चाहती थी।
नाइन कंपनी के मालिक ने किया संपर्क
2015 से लेकर अब तक अमित ने नेपाल तक महिलाओं को फ्री में सेनेटरी पैड बांटे हैं, अपने काम को लेकर अमित पॉपुलर होते चले गए और इस पापुलैरिटी ने अमित का नाम नाइन कंपनी के मालिक शरद खेमका तक पहुंचा दिया। शरद ने अमित को कानपुर मिलने के लिए बुलाया और अमित के ज़रिए अपने पैड स्कूलों, स्लम और गांव तक तक पहुंचाना शुरू किया।
सैनिटरी पैड के साथ शैंपू फ्री
साल 2020 में अमित ने अपना पैड बनाना शुरू किया और उसका नाम रखा "हिम्मत" इस पैड के जरिए अमित ने "मर्द को दर्द नही होता है" कोट को तोड़ने की कोशिश किया, और कहा "जो महिलाओं का समझे दर्द वही होता है असली मर्द" अमित के एक सैनिटरी नैपकिन के पैकेट में 7 पैड होते हैं और साथ में एक शैम्पू फ्री दिया जाता है क्योंकि गांव में और स्लम में आज भी महिलाएं माहवारी के पांचवें दिन नहाती हैं। पैर के साथ शैंपू की स्कीम ने महिलाओं को आकर्षित किया आज 5 स्कूलों में अमित के बनाए सेनेटरी पैड का पैड बैंक है, जागरूकता कार्यक्रम में उनके पैड फ्री में बांटे जाते हैं, सृजन फाउंडेशन के अंतर्गत अमित और भी बहुत सारे प्रोजेक्ट चला रहे हैं जैसे लोगों को फ्री में खाना देना बच्चों को फ्री में एजुकेशन देना और अपने इस काम से वो बहुत संतुष्ट हैं।
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