
लखनऊ. राजधानी की सड़कों पर अक्सर ट्राईसाइकिल वाले डिलीवरी बॉय को देख कर लोग दांतो तले उंगलियां दबा लेते हैं, मेरी जब नजर उन पर पड़ी तो मैंने उनका पीछा किया और उन्हें रोक लिया, चूंकि वो फूड डिलीवर करके लौट रहे थे लिहाज़ा मुझे दस मिनट का समय दिया और बातों का सिलसिला शुरू हुआ।
कोविड में खत्म हुई कॉस्मेटिक की दुकान
विनोद लखनऊ के गाजीपुर गांव में रहते हैं जब 7 महीने के थे तो कमर के नीचे का हिस्सा पैरालाइज हो गया था, मां बाप ने इलाज कराया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ, विनोद की उम्र 32 साल है, दिव्यांगता का बहाना लेकर उन्होंने भीख नहीं मांगा बल्कि मेहनतकश जिंदगी गुजारी। नौकरी से पहले पायरेटेड सीडी बेचते थे फिर कॉस्मेटिक का काम शुरू किया लेकिन कोविड में काम धंधा ठप हो गया, घर में पत्नी और दो बच्चों की जिम्मेदारी ने विनोद को बैठने नहीं दिया। विनोद की पत्नी भी दिव्यांग हैं, काम न होने पर विनोद ने अपने मोबाइल पर ऑनलाइन फूड डिलीवरी की वैकेंसी भरी और चयन भी हो गया और फिर विनोद ने लोगों के घरों में खाना पहुंचाना शुरू किया।
8 घंटे रिचार्ज के बाद 12 फ़ूड डिलीवरी
विनोद की गाड़ी दिन भर में 60 किलोमीटर दौड़ती है, दिन भर में दस से बारह आर्डर डिलीवर करते हैं, उनकी ट्राई साइकिल इलेक्ट्रिक है तो 8 घंटे चार्ज होती है किसी दिन लाइट नहीं हुई तो आर्डर भी नहीं लेते हैं। विनोद दिव्यांग हैं तो अपार्टमेंट या काम्प्लेक्स में ऊपर नहीं चढ़ते हैं बल्कि कस्टमर को नीचे बुला लेते हैं जिसे लेकर कुछ कस्टमर उन्हें अपशब्द भी कह देते हैं लेकिन ज़्यादातर उनके हौसले को सलाम करते हैं इसलिए वो किसी की बात का बुरा नही मानते।
एक बार आर्डर आ गया तो जाना तो पड़ेगा
विनोद कहते हैं धूप हो बारिश हो, आंधी हो या ओले गिरें, ट्रैफिक हो या कोई समस्या एक बार अगर आर्डर आ गया तो हर हाल में पहुंचाना है, आर्डर के समय जाम देख कर पसीने छूटने लगते हैं कि देर होने पर कस्टमर नाराज़ हो जाएगा इसलिए जब फ़ूड डिलीवरी के लिए निकलता हूं तो प्यास लगने पर पानी भी नही पी पाता देर होती है तो ग्राहक के साथ साथ कम्पनी भी कॉल करने लगती है, इसलिए कोशिश करता हूँ कि जल्द से जल्द कॉलर के पास फ़ूड डिलीवरी हो जाए।
एक ग्राहक ने बांध दिया खम्भे से
एक दुख भरा अनुभव शेयर करते हुए विनोद की आंखें भर आईं, उन्होंने बताया कि साल 2022 में एक ग्राहक को आर्डर देने गया, ग्राहक घर से निकला नही, उन्होंने कई बार उस ग्राहक को कॉल किया लेकिन उसने फोन नहीं रिसीव किया। विनोद ने अपनी कंपनी को बताया, कंपनी ने भी कॉल किया जब फोन नहीं रिसीव हुआ तो आर्डर कैंसिल हुआ और जब विनोद वापस जाने लगे तब वह शख्स घर के बाहर आया और विनोद को पकड़कर अपने घर के एक खम्भे से बांध दिया, दिनेश ने पुलिस को कॉल किया लेकिन इतनी देर में दूसरा आर्डर आ गया। किसी तरह विनोद दूसरी जगह ऑर्डर पहुंचाने गए और पुलिस की कॉल पर उस जगह वापस आए जिसके बाद पुलिस ने भी उन्हें ही दोषी ठहराया और कहा कि तुम तो भाग गए थे।
हाईवे पर कभी-कभी एक्सीडेंट के भी हालात बने
विनोद कहते हैं, हाईवे पर गर्मी में कई दफा बस और ट्रक के साइलेंसर के धुएं झेलना पड़ता है, तेज रफ्तार गाड़ियों से खुद को बचाना पड़ता है। ट्रक के पहिये से छोटी ट्राईसाइकिल है मेरी, कभी कभी तेज़ स्पीड में जान जाते जाते बची है, भगवान का नाम लेकर निकलता हूँ, मेहनत ज़रूर है लेकिन उसका फल अच्छा मिलता है तो अच्छा लगता है।
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