
तेलंगाना की सरिता दिल्ली की पहली डीटीसी महिला बस ड्राइवर है। सरिता जब 18 साल की थी तबसे ड्राइविंग कर रही है। सरिता के पिता जब बीमार पड़े तो सरिता ने लड़कों का कपड़ा पहनना शुरू किया और ऑटो चलाने लगी। 3 साल बाद उन्हें ड्राइविंग लाइसेंस मिल गया और वह अपने गांव में ऑटो चलाती रही। सरिता दिल्ली कैसे पहुंची,क्यों उन्होंने बस ड्राइवर जैसे काम को चुना तमाम बातें सरिता ने माय नेशन हिंदी से शेयर की।
कौन हैं सरिता
सरिता तेलंगाना की रहने वाली हैं उनके पिता किसान थे और मां हाउसवाइफ। पांच बहनों में सरिता सबसे छोटी थी। खेती किसानी करके पिता ने हर बेटी को पढ़ाने की पूरी कोशिश की ताकि बेटियां आत्मनिर्भर बन सकें। इसी बीच सरिता के पिता की तबीयत खराब हुई। खेती छूट गई और घर की आर्थिक स्थिति खराब हो गई। फिर बाढ़ आई और बाढ़ में फसल तबाह हो गयी। घर के हालात बिगड़ते चले गए और सरिता ने तय किया कि वह पढ़ाई छोड़कर काम करेंगी।
पुलिस ऑफिसर बनना चाहती थी सरिता
सरिता ने बताया कि वह किरण बेदी से बहुत इनफ्लुएंस थी इसलिए पुलिस ऑफिसर बनना चाहती थी लेकिन आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी। सरिता की जीजा ने उन्हें हौसला दिया और सरिता ने अपने जीजा का ऑटो चलाना शुरु किया। गांव में ऑटो चलाने की बहुत सारे चैलेंज थे। जिसे सरिता हर रोज फेस करती थी।
बदलना पड़ा हुलिया
सरिता ने बताया की लड़की की ऑटो चलाता देख अक्सर लोग इधर-उधर छूते थे,हाथ रखते थे इसलिए उन्होंने लड़कों की वेशभूषा अपना लिया। बाल कटवाए और पैंट शर्ट पहनकर लड़कों की तरह रहने लगी। सरिता ने बताया कि ऑटो वाले भी उन्हें बहुत परेशान करते थे कभी ऑटो पंचर कर देते थे कभी कोई टेक्निकल फॉल्ट कर देते थे। लेकिन सरिता ने हौसला नहीं आ रहा और अपने काम के लिए डटी रहीं।
दिल्ली की आजाद फाउंडेशन में दिखाई नहीं राह
ऑटो चलाने के दौरान सरिता ने आजाद फाउंडेशन के बारे में पढ़ा जो महिलाओं को ड्राइविंग की ट्रेनिंग दे रहा था। घर पर किसी से कुछ कहे बगैर सरिता दिल्ली आ गई और इंटरव्यू दे दिया जिसमें वह चुन ली गईं। अब सबसे बड़ा प्रॉब्लम था सरिता को हिंदी नहीं आती थी इसलिए दिल्ली में सेटल होने में 1 साल लग गया। आजाद फाउंडेशन ने सरिता को हिंदी सीखने में समझने में बहुत मदद किया।
और फिर मिल गई डीटीसी में नौकरी
जब डीसी में बस ड्राइवर की वैकेंसी आई तो सरिता के साथ-साथ 15 लड़कियों को टेस्ट के लिए बुलाया गया लेकिन उनमें सिर्फ सरिता का सिलेक्शन हुआ। सरिता कहती हैं कि वहां के लोगों ने मुझे बहुत सपोर्ट किया और 2015 में डीटीसी में उन्हें कॉन्ट्रैक्ट बेस नौकरी मिल गई। यहां भी सरिता को भेदभाव झेलना पड़ा क्योंकि पुरुष ड्राइवर को यह बर्दाश्त नहीं था कि एक लड़की ड्राइविंग करें।
और फिर मिली डीटीसी बस की चाबी
सरिता ने बताया दिल्ली सचिवालय का उद्घाटन था। सरिता के साथ उनका पूरा स्टाफ था और तभी बस की चाबी सरिता के हाथ में दे दी गई वहां उन्होंने बस चलाया और मीडिया कवरेज के बाद अपने स्टाफ को इस बस से लेकर वापस लौटी। रास्ते में खतरनाक मोड़ था डीएम को लगा कि यह लड़की यहां बस मोड नहीं पाएगी लेकिन सरिता ने टर्न लिया और सबको मंजिल तक पहुंचा दिया।
राष्ट्रपति से मिला सम्मान
सरिता ने बताया कि वह दिल्ली की पहली महिला डीटीसी बस ड्राइवर थी जिसके कारण उन्हें कई पुरस्कार मिले। उनकी रोल मॉडल किरण बेदी ने भी उन्हें पुरस्कार दिया। 2 साल बाद प्रेसिडेंट अवॉर्ड मिला। तेलंगाना सरकार ने ₹100000 और अवार्ड दिया उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार में सम्मान मिला। सम्मान तो खूब मिला लेकिन परमानेंट नौकरी नहीं हो सकी आज भी सरिता कॉन्ट्रैक्ट पर ही काम कर रही है।
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