1993 सीरियल ब्लास्ट केस: आरोपी अब्दुल करीम टुंडा कैसे हो गया बरी? अजमेर की टाडा कोर्ट ने सुनाया फैसला

Rajkumar Upadhyaya |  
Published : Feb 29, 2024, 01:44 PM ISTUpdated : Feb 29, 2024, 01:48 PM IST
1993 सीरियल ब्लास्ट केस: आरोपी अब्दुल करीम टुंडा कैसे हो गया बरी? अजमेर की टाडा कोर्ट ने सुनाया फैसला

सार

राजधानी एक्सप्रेस में 6 दिसंबर 1993 को आतंकवादियों ने सीरियल ब्लास्ट किया था। इसे बाबरी मस्जिद विध्वंस की पहली बरसी का बदला बताया गया था। 17 आरोपी अरेस्ट हुए थे। उन्हीं आरोपियों में से 3 को लेकर गुरुवार को फैसला आया। जिसमें अब्दुल करीम टुंडा बरी हो गया। जबकि दो आरोपी दोषी करार दिए गए। 

जयपुर। 1993 सीरियल बम ब्लास्ट केस में गुरुवार को बड़ा फैसला आया। अजमेर की टाडा कोर्ट ने आरोपी अब्दुल करीम टुंडा को बरी कर दिया है। वह 5 शहरों में सीरियल ब्लास्ट केस में आरोपी था। साल 2014 से विचाराधीन केस में दो आतंकियों इरफान और हमीदुद्दीन को दोषी करार दिया गया है। पूरे मामले में 17 आरोपी अरेस्ट किए गए थे। बहुचर्चित शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेन में बम ब्लास्ट के मामले में टुंडा पर केस चल रहा था। 

क्या है पूरा मामला?

राजधानी एक्सप्रेस में 6 दिसंबर 1993 को आतंकवादियों ने सीरियल ब्लास्ट किया था। इसे बाबरी मस्जिद विध्वंस की पहली बरसी का बदला बताया गया था। 17 आरोपी अरेस्ट हुए थे। उन्हीं आरोपियों में से 3 को लेकर गुरुवार को फैसला आया। जिसमें अब्दुल करीम टुंडा बरी हो गया। जबकि दो आरोपी दोषी करार दिए गए। 

2014 में अरेस्ट हुआ था आरोपी अब्दुल करीम टुंडा

ट्रेन में सीरियल बम धमाके की जांच के बाद 17 आरोपी अरेस्ट हुए। उनमें से इमरान को अंतरिम जमानत मिल गई थी, जो बाद में फरार हो गया। टुंडा और हमीमुद्दीन भी केस दर्ज होने के बाद फरार हो गए थे। अब्दुल करीम टुंड को साल 2014 में नेपाल बॉर्डर से अरेस्ट किया गया था। जबकि हमीमुद्दीन और इरफान साल 2010 में गिरफ्तार हुए थे।

बगैर चार्जशीट के चल रहा था अब्दुल करीम टुंडा का केस

दरअसल, इस पूरे मामले में सीबीआई ने उसी समय चार्जशीट दाखिल कर दी थी। फरार आरोपी इमरान की गिरफ्तारी के बाद सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की गई थी। अब्दुल करीम टुंडा के खिलाफ सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल नहीं हो सकी थी। पिछले 10 साल से बिना आरोप पत्र के ही टाडा कोर्ट में उसका केस चल रहा था।

कौन है अब्दुल करीम टुंडा?

यूपी के हापुड़ के पिलखुवा कस्बे का रहने वाला अब्दुल करीम टुंडा पहले कारपेंटर का काम करता था। फिर मुंबई के भिवंडी में अपने कुछ रिलेटिव के पास कपड़े का कारोबार करने चला गया। 1985 में भिवंडी में हुए दंगों में उसके कुछ रिश्तेदारों की मौत हो गई। उसका बदला लेने के लिए उसने 1980 के आसपा आतंकी राह पकड़ी।

अब्दुल करीम का नाम कैसे पड़ा टुंडा?

जानकारी के अनुसार, अब्दुल करीम टुंडा आतंकी संगठन लश्कर से जुड़ा था। रिपोर्ट्स के अनुसार, वह लोगों को जिहाद की ट्रेनिंग देता था। 1985 में टोंक जिले में एक मस्जिद में जिहाद की ट्रेनिंग दे रहा था। उस समय वह लोगों को पाइप गन चलाने के बारे में बता रहा था और उसे चलाकर दिखा रहा था। उसी समय गन फटने से उसका हाथ उड़ गया और उसके नाम के आगे तभी से टुंडा जुड़ गया।

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