भूपेन हजारिका के बेटे सरकार से नाराज पर नहीं उठाएंगे ये कदम, जानें क्या है मामला

Published : Feb 12, 2019, 10:47 AM IST
भूपेन हजारिका के बेटे सरकार से नाराज पर नहीं उठाएंगे ये कदम, जानें क्या है  मामला

सार

पिछले महीने केन्द्र सरकार ने असम के प्रसिद्ध गायक, संगीतकार स्वर्गीय भूपेन हजारिका को भारत रत्न से नवाजा था। सरकार ने हजारिका के साथ ही नानाजी देशमुख और पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को भारत रत्न दिया था। 

पिछले महीने केन्द्र सरकार ने असम के प्रसिद्ध गायक, संगीतकार स्वर्गीय भूपेन हजारिका को भारत रत्न से नवाजा था। सरकार ने हजारिका के साथ ही नानाजी देशमुख और पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को भारत रत्न दिया था। भूपेन हजारिका के बेटे तेज हजारिका फिलहाल भारत सरकार के सिटीजनशिप बिल को लेकर नाराज हैं। लेकिन उनका कहना है कि वह इस सम्मान को भारत सरकार को लेंगे। लेकिन वह इस बिल पर अपना विरोध जताते रहेंगे।

मीडिया में ये खबरें चल रही थी कि तेज हजारिका भारत सरकार द्वारा हाल ही में धोषित किए गए भारत रत्न पुरस्कार को लेने नहीं जाएंगे। ये पुरस्कार राष्ट्रपति द्वारा दिया जाता है। उन्होंने इस बात को खारिज किया कि वो अपने पिता को दिए गए भारत रत्न का सम्मान नहीं लेने वाले हैं। पिछले महीने सिनेमा, संगीत और कला के क्षेत्र में योगदान के लिए भूपेन हजारिका को भारत रत्‍न देने का ऐलान किया गया था।

तेज हजारिका सिटीजनशिप बिल से खुश नहीं हैं। उनका कहना है कि नागरिकता को लेकर एक अलोकप्रिय बिल पास करने की योजना चल रही है। जूनियर हजारिका ने एक बयान मीडिया में जारी करते हुए कहा कि  पिता के नाम पर 'भारत रत्न' सम्मान लेने के लिए अभी तक मुझे कोई आमंत्रण प्राप्त नहीं हुआ है। भारत रत्न मिलना देश और राज्य के लिए सम्मान की बात है। लेकिन केन्द्र सरकार के इस सिटीजनशिप बिल ने कुछ ही दिनों में जोश ठंडा कर दिया है।

उन्होंने कहा कि सिटीजनशिप बिल में उनके पिता के नाम का इस्तेमाल किया जा रहा है। असल में नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर असम में काफी वक्त से विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है। आज केन्द्र सरकार इस बिल को राज्यसभा में पेश करेगी। इस बिल के राज्यसभा से पारित हो जाने के बाद ये कानून बन जाएगा।

इस संसोधित बिल के मुताबिक पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आए गैर मुस्लिम धार्मिक अल्पसंख्यकों को केवल छह साल में भारतीय नागरिकता मिल जाएगी। जबकि पहले ये 12 साल की अनिवार्यता थी। इस बिल को लेकर पूर्वोत्तर में विरोध किया जा रहा है। क्योंकि उनका मानना है कि इससे उनकी सांस्कृतिक, भाषाई और पारंपरिक विरासत में असर पड़ेगा।

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