
नई दिल्ली। कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी हरियाणा और महाराष्ट्र में सरकार न बना पाने से ज्यादा अयोध्या को लेकर परेशान दिख रही हैं। क्योंकि अयोध्या पर अगले सप्ताह तक फैसला आना है। लेकिन पार्टी को क्या रूख अपना चाहिए। इसको लेकर पार्टी बंटी हुई है। पार्टी के एक धड़े का मानना है कि पार्टी ने पिछले दिनों जिस तरह से हिंदू वोटर को लुभाने की रणनीति अपनाई थी उसी पर उसे कामय रहना चाहिए। जबकि एक धड़े का मानना है कि पार्टी को अपने धर्म निरपेक्षता के स्टैंड पर कायम रहना चाहिए।
असल में पिछले साल दिसंबर में तीन राज्यों में हुए चुनाव में कांग्रेस इन तीनों राज्यों में सरकार बनाने में कामयाब रही। उस वक्त पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी और उन्होंने मंदिर राजनीति शुरू की थी और इसका फायदा कांग्रेस को मिला। राहुल के मंदिरों के दर्शन करने से हिंदू वोटरों का रूझान कांग्रेस की तरफ हुआ है। यही नहीं लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपने साफ्ट हिंदू राणनीति पर काम किया। हालांकि उसे ज्यादा फायदा नहीं मिला।
लेकिन उसके कुछ सीटें जरूर बढ़ी। हालांकि ये सीटें दक्षिण भारत में बढ़ी। लिहाजा एक धड़ा मान रहा है कि इसके जरिए कांग्रेस अपने पुराने हिंदू वोटरों को टारगेट कर सकती है और वह फिर से कांग्रेस में वापस आ सकते हैं। वहीं एक गुट का मानना है कि कांग्रेस को धर्मनिरपेक्ष की छवि को बरकरार रखना चाहिए। फैसला चाहे जो भी आए उसे धर्मनिरपेक्षता के चश्में देखकर स्टैंड लेना चाहिए।
कांग्रेस का एक धड़ा मान रहा है कि ये एक बेहद नाजुक मसला है,इस पर बयान जारी करना दूसरे पक्ष को चोट पहुंचा सकता है। हालांकि पार्टी के दक्षिण भारत से आने वाले नेता पार्टी को धर्मनिरपेक्ष बने रहने के लिए कह रहे हैं। क्योंकि इस बार कांग्रेस ने दक्षिण भारत में अच्छा प्रदर्शन किया है। जबकि उत्तर भारत के नेता इसे कांग्रेस की छवि बदलने वाले बड़े अवसर के रूप में देखते हैं।
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