
नई दिल्ली। संसद की कैंटीन में सांसदों को मिलने वाले रियायती खाने पर केन्द्र सरकार ने एक बार फिर कैंची चली दी। हालांकि इस सब्सिडी को कम करने के लिए सभी सांसदों ने सहमति दी। जिसके बाद केन्द्र सरकार ने ये फैसला किया है। हालांकि कई सामाजिक संगठन सांसदों को दिए जाने वाली सब्सिडी के खिलाफ थे और अकसर इसे मुद्दा बनाकर सांसदों को घेरते थे।
संसद की कैंटीन में अब सांसदों को दो रुपये में चपाती, पांच में दाल, 50 में चिकन करी नहीं मिलेगी। इसके अब सांसदों की जेब ढीली करनी होगी। इसका फैसला केन्द्र की मोदी सरकार ने लिया है। हालांकि 2016 में मोदी सरकार सांसदों को दी जाने वाली कैंटीन सब्सिडी में कटौती की थी। केन्द्र सरकार के इस फैसले के बाद 17 करोड़ रुपये की बचत होगी।
जानकारी के मुताबिक इसके लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष के सांसदों ने सर्वसम्मति से लिया फैसला। हालांकि इससे पहले केन्द्र सरकार की पहल पर सांसद सब्सिडी वाले गैस सिलेंडर को छोड़ चुके हैं। इससे जनता में अच्छा संदेश गया है। लोकसभा अध्यक्ष ओम कुमार बिड़ला के सुझाव के बाद सभी सांसदों ने इस पर फैसला लिया। हालांकि इससे पहले जनता और सामाजिक संगठन भी सांसदों को दी जाने वाली इस सुविधा को बंद करने की मांग कर चुके हैं।
जानकारी के मुताबिक संसद की कैंटीन में सांसदों को कुल लागत का 80 फीसदी सब्सिडी के तौर पर दिया जाता है। जिसके कारण यहां पर खाना सस्ता है और ये अस्सी फीसदी हिस्सा केन्द्र सरकार वहन करता था। हालांकि इससे पहले सांसद बिजयंत जय पांडा ने स्पीकर को चिट्ठी लिखकर सब्सिडी खत्म किए जाने की मांग की थी। हालांकि ये मांग उन्होंने 2015 में उठाई थी और उसके वक्त वो बीजेडी के सांसद थे। जानकारी के मुताबिक 2012-17 तक संसद की कैंटीन में सांसदों के खान पर 73 करोड़ की सब्सिडी दी गई।
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