
नई दिल्ली। आर्यन सिद्धांत को लेकर ब्रिटिश पुरातत्वविद् मोर्टिमर व्हीलर ने आर्यन आक्रमण सिद्धांत का प्रस्ताव दिया था। ये एक तरह से ब्रिटिश इतिहासकारों की एक साजिश का हिस्सा था। जिसके जरिए वह भारत में राज करना चाहते थे। व्हीलर ने 1940 के दौरान अपने दोस्तों को कुछ पत्र लिखे थे और इससे ये साबित होता है कि वह कितने नस्लवादी थे। उन्होंने अपने दोस्तों को जो पत्र लिखा है उनसें ये लिखा है कि भारत में रहते हुए उन्हें लगता है कि वह कि 1800 के दशक में वह वापस आ गए हैं। जिसके मायने साफ थे कि भारत अंग्रेजों की तुलना में एक सदी पीछे है। लेकिन वह इस बात का उल्लेख करना भूल गए कि इस देश में जब अंग्रेज भारतीयों के रक्त से स्नान कर रहे थे तो भारतीय बहस और चर्चा के माध्यम से अपने मुद्दों को हल कर रहे थे।
वायसराय ने उन्हें गुप्त जनादेश दिया, क्यों?
असल में ईस्ट इंडिया कंपनी सन् 1857 के विद्रोह के बाद डर गई थी और उन्हें इस बात का डर सता रहा था कि अंग्रेजों का भारत पर नियंत्रण खत्म हो सकता है। लिहाजा वे विभाजन और शासन के सिद्धांत के साथ आए। इसके लिए उन्होंने एक नए सिद्धांत को जन्म दिया। उन्होंने कहा कि भारत में अधिकांश लोग स्थानीय नहीं हैं और वे भारत के मूल निवासी नहीं हैं। वे बाहरी लोग हैं जिन्होंने हड़प्पा और मोहन जोदड़ो सभ्यताओं पर आक्रमण किया था। इसके लिए जो नए तर्क दिए, उसके मुताबिक उन्होंने “फेयर-स्किनड” वाले उत्तर भारतीयों को आक्रमणकारी बताया और कहा कि वो बाहर से आए हैं जबकि “डार्क-स्किन” वाले दक्षिण भारतीय भारत के मूल निवासी हैं।
तो इस आर्यन आक्रमण सिद्धांत की क्या आवश्यकता थी?
असल में अंग्रेज इस बात से अच्छी तरह से परिचित थे कि सनातन धर्म या सनातनसभा पश्चिमी सभ्यताओं की तुलना में बहुत विकसित था। हम सभी क्षेत्रों में उनसे बेहतर थे। इसलिए, भारतीयों को नियंत्रित करने का एकमात्र तरीका उन्हें हीनता का अनुभव कराना था। सबसे पहले, रंग के आधार पर एक नस्लीय विभाजन बनाएँ और फिर उन्हें आगे ध्रुवीकृत करने के लिए उत्तर-दक्षिण विभाजन बनाएँ। यह सिर्फ एक सिद्धांत नहीं था, यह एक ढांचा था जो यह सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया था कि भारतीय कभी एकजुट न हो सकें और आपस में लड़ते रहें और अंग्रेज इससे जरिए भारत पर राज करें।
हालांकि, अभी भी कई इतिहासकार हैं जो इस सिद्धांत पर विश्वास करना जारी रखे हुए हैं। यह हमारे समाज के लिए एक खतरा बन जाता है अगर गलत तथ्यों का प्रचार किया जा रहा है। हाल ही में हरियाणा के राखीगढ़ी में एक पुरातात्विक खुदाई में कुछ कंकालों की खोज हुई है। इन कंकालों के डीएनए परीक्षण के परिणामों से पता चलता है कि दुनिया भर की किसी भी सभ्यता के साथ इस डीएनए की कोई समानता नहीं थी। इससे साबित होता है कि आर्य वास्तव में भारत का हिस्सा हैं और वह बाहर से नहीं आए थे और न ही उन्होंने किसी पर हमला किया था।
अभी तक जितनी भी सरकारें आई हैं उन्होंने एक ही सिद्धांत का प्रचार किया है, लेकिन अब ये सिद्धांत अंततः गलत साबित हो रहे हैं। अगर कई इतिहासकार अभी भी इस सिद्धांत पर विश्वास करना जारी रखते हैं तो ये समाज के लिए खतरा हो सकता है। यह हमारे समाज के लिए एक खतरा बन सकता है। क्योंकि इसके जरिए गलत तथ्यों को पेश और प्रचारित किया जा रहा है।
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