लालू के बेटे तेजस्वी ने क्यों कर लिया कन्हैया कुमार से किनारा? जानिए चार प्रमुख कारण

Published : Mar 23, 2019, 02:28 PM ISTUpdated : Mar 23, 2019, 11:20 PM IST
लालू के बेटे तेजस्वी ने क्यों कर लिया कन्हैया कुमार से किनारा? जानिए चार प्रमुख कारण

सार

बहुत अपनत्व दिखाने के बाद भी आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव ने देशविरोधी नारे लगाने वाले जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार को आखिरकार अंगूठा दिखा दिया। कन्हैया अब बेगूसराय से महागठबंधन के उम्मीदवार नहीं रहेंगे। उन्हें आगामी चुनाव में अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी। 

पटना: आरजेडी के वर्तमान अध्यक्ष और लालू के बेटे तेजस्वी यादव ने कन्हैया कुमार से पीछा छुड़ा लिया है। ऐसी खबरें थीं कि कन्हैया कुमार बिहार के बेगूसराय से महागठबंधन के उम्मीदवार हो सकते हैं। लेकिन ऐन समय पर तेजस्वी ने अड़ंगा लगा दिया।
बिहार में आरजेडी के सीट बंटवारे से अब यह स्पष्ट हो गया है कि कन्हैया कुमार महागठबंधन का हिस्सा नहीं होंगे। बेगूसराय सीट आरजेडी के खाते में आई है। 

कन्हैया कुमार की पार्टी सीपीआई ने मांग की थी कि उसे बिहार में तीन से चार सीटें दी जाए। लेकिन उनकी मांग के नजरअंदाज करते हुए सिर्फ एक सीट दी गई। 

बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं। जिसमें से आरजेडी 20 और कांग्रेस नौ सीटों पर लड़ेगी। आरजेडी प्रमुख तेजस्वी वामपंथी दलों को ज्यादा सीट देने के लिए तैयार नहीं हुए।

खास बात यह है कि हाल फिलहाल में तेजस्वी और कन्हैया के बीच बहुत नजदीकियां देखी गई थीं। इन दोनों ने कई बार साथ मंच भी साझा किया था। 

तेजस्वी ने पटना में एक बार कन्हैया को अपने लोगों में गिनते हुए बयान दिया था कि "जो भी भाजपा के ख़िलाफ़ बोलता है, उस पर मुक़दमा होता है। ‘हमारे लोगों’ के साथ ऐसा ही हो रहा है।"
लेकिन जब साथ चुनाव लड़ने की बारी आई तो सारी नजदीकियां हवा हो गईं और तेजस्वी ने कन्हैया कुमार को अंगूठा दिखा दिया।
 
इसके कई कारण गिनाए जा सकते हैं:

1.    
वामपंथी नेता कन्हैया तब चर्चा में आए थे, जब उनके जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष रहते हुए देशविरोधी नारे लगाए गए थे। आरोप है कि इसमें कन्हैया की भी सहमति थी। इस मामले में अभी भी अदालत में मामला चल रहा है। 

ऐसे में कांग्रेस और तेजस्वी दोनों को लग रहा होगा कि राष्ट्रविरोधी छवि वाले कन्हैया कुमार को साथ लेने से बीजेपी और जेडीयू नेताओं को उनपर आरोप लगाने का मौका मिल जाएगा। 

महागठबंधन किसी ऐसे व्यक्ति को साथ नहीं लेना चाहता, जिसे बहुत कट्टरपंथी माना जाता हो।  क्योंकि भाजपा या एनडीए कन्हैया कुमार के ख़िलाफ़ बहुत से ऐसे मुद्दे खड़े कर सकता था, जिसका जवाब देना वर्तमान राष्ट्रवादी माहौल में महागठबंधन नेताओं के लिए भारी पड़ता। 

2.    

अगर तेजस्वी कन्हैया कुमार की मदद करते तो इससे कन्हैया का फायदा होता। लेकिन तेजस्वी या उनकी पार्टी को कोई लाभ नहीं होता। क्योंकि बिहार में आरजेडी जमीनी स्तर पर दूसरी सबसे मजबूत पार्टी है। जबकि वामपंथी दलों का कोई आधार नहीं बचा।
 
कन्हैया की पार्टी सीपीआई के पास दूसरे लोकसभा क्षेत्र में जनाधार नहीं है कि वह अपने वोट बैंक महागठबंधन को ट्रांसफर कर पाए। यदि कन्हैया की पार्टी को तेजस्वी टिकट देते भी तो दूसरी सीटों पर इसका कोई फ़ायदा नहीं पहुंचता। 

ऐसे में कन्हैया को आरजेडी के कैडर वोटों का फायदा तो मिल जाता, लेकिन आरजेडी को कन्हैया की मदद करने का लाभ होने की बजाए घाटा ही होता। 

क्योंकि कन्हैया की देशविरोधी छवि बाकी सीटों पर आरजेडी को भारी पड़ती। ऐसे में तेजस्वी के सलाहकारों ने उन्हें समझाया होगा कि कन्हैया को साथ रखना घाटे का सौदा होगा। क्योंकि इससे उन्हें कोई लाभ नहीं होने जा रहा है। 


3.    

जेएनयू में देशविरोधी नारे वाले कांड के बाद कन्हैया का नाम लोग देशभर में जान गए थे। उनका भारी विरोध हुआ, बदनामी हुई। लेकिन नकारात्मक वजहों से ही लोग उन्हें जान गए थे। 

उधर तेजस्वी एक वंशवादी पार्टी के मुखिया हैं। बिहार के बाहर उनका कोई अस्तित्व नहीं है। ऐसे में हो सकता है कि तेजस्वी में मन में कन्हैया कुमार को लेकर असुरक्षा की भावना रही होगी। उन्हें डर होगा कि अगर उनकी मदद के कन्हैया जीतकर लोकसभा पहुंच जाएंगे तो उनपर आरजेडी का कोई नियंत्रण नहीं रहेगा। 

आरजेडी के रणनीतिकारों को यह बात जरुर खटकी होगी कि कन्हैया की राष्ट्रविरोधी ही सही लेकिन एक सत्ता के खिलाफ संघर्ष करने वाले की छवि है, उसके सामने तेजस्वी का क़द कहीं छोटा न पड़ जाए। 


4.    

भारतीय जनता पार्टी बेगूसराय से गिरिराज सिंह को उम्मीदवार बनाना चाहती है। कन्हैया कुमार भी भूमिहार जाति से ही आते हैं। पिछली बार यानी 2014 में यहां से भूमिहार जाति के बीजेपी उम्मीदवार भोला सिंह 4.28 लाख वोट पाकर जीते थे। उनका अब देहांत हो चुका है। 

उस समय आरजेडी के तनवीर हसन 3.70 लाख वोट पाकर दूसरे नंबर पर रहे थे। उन्हें भोला सिंह से मात्र 58 हजार कम वोट मिले थे। शायद इन्हीं समीकरणो की वजह से भी आरजेडी ने कन्हैया कुमार से किनारा किया है। 

तेजस्वी के मन में विचार होगा कि गिरिराज और कन्हैया में भूमिहार जाति के वोट बंट जाएंगे। जिससे उनके उम्मीदवार को जीतने में आसानी होगी। बेगूसराय में भूमिहार जाति का वोट निर्णायक माना जाता है। 

ऐसे में चुनावी खेल कन्हैया बनाम गिरिराज हुआ तो फ़ायदा आरजेडी को मिल सकता है। 

यह भी पढ़िए- गिरिराज कन्हैया में जबरदस्त टक्कर की आशंका

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