राजस्थान का पिपलांत्री गांव अनोखी परम्परा के लिए जाना जाता है।  दरअसल इस गांव में बेटी के पैदा होने पर ढोल नगाड़ा बजाया  जाता है और साथ ही 111 पेड़ लगाए जाते हैं। इस गांव में अब तक एक लाख से ज़्यादा पेड़ लगाए जा चुके हैं। इस परम्परा की शुरुआत के पूर्व सरपंच श्याम सुंदर पालीवाल ने साल 2005 में किया था जिसके बारे में शयाम सुंदर ने माय नेशन हिंदी से शेयर किया। 

बेटी की मृत्यु के बाद शुरू किया पहल 

गांव के पूर्व सरपंच श्याम सुंदर पालीवाल ने बताया की गांव में  हर साल औसतन 60 लड़कियां पैदा होती है।  18 साल की  उम्र उनकी बेटी किरण की मौत डिहाइड्रेशन की वजह से हो गई थी। बेटी की मौत के बाद श्याम सुंदर सदमे में चले गए थे। उन्होंने तय किया की कुछ भी हो जाए कुछ ऐसा काम करेंगे की गांव में पानी की कमी न हो। और इस तरह गांव में पेड़ लगाने की मुहीम हुरु की गयी। गांव में हरियाली और पानी के साथ स्वच्छता का भी पूरा ध्यान रखा जाता हैं । साल 2007 में इस गांव को शौच मुक्त होने पर स्वच्छता पुरस्कार भी मिला था।

परिवार के लोग लगाते हैं पौधा 

श्याम सुंदर ने बताया की पिछले 19 साल से गांव के लोग पौधे लगाने की परम्परा का निर्वहन कर रहे हैं।  जिस घर में बेटी पैदा होती है उस घर के आस पड़ोस , रिश्तेदार , नातेदार , दोस्त सब मिलकर पौधे लगाते हैं।  जैसे जैसे बेटियां बड़ी होती हैं ये पौधे भी बड़े होते हैं।  सिर्फ पौधों को लगाया ही नहीं जाता बल्कि उनका ख्याल भी रखा जाता है।  खाद पानी के साथ साथ गुड़ाई का ध्यान रखा जाता है। अब पिपलांत्री गांव देखने दूर दूर से टूरिस्ट भी आते हैं। 

बेटियों का भविष्य किया जाता है सुरक्षित 

श्याम सुंदर ने बताया की बेटियों के भविष्य के लिए उन के जन्म के समय, लड़की के माता-पिता से 10,000 रुपए और डोनर से 31,000 रुपए इकठ्ठा किए जाते हैं और फिर उन्हें फिक्स्ड डिपोसिट में डाल दिया जाता है। गांव के  पंचायत रजिस्ट्रार में बिटिया  के जन्म की जानकारी दर्ज की जाती है। इसके साथ ही जननी सुरक्षा योजना और अन्य लाभकारी सरकारी बांड योजनाओं के लिए सभी आधिकारिक औपचारिकताएं पूरी की जाती हैं। 

पद्मश्री से  सम्मानित

साल 2021 में श्याम सुंदर पालीवाल को पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया है। श्याम सुंदर ने बताया की गांव की बेटियां  पौधों को भाई की तरह मानती हैं और हर साल  रक्षाबंधन पर पौधों को राखी बांधती हैं। एक समय था जब पिपलांत्री में  जल स्तर 500 फुट की गहराई था, लेकिन आज वहां पानी के अनेकों झरने हैं।  

पेड़ों से रोज़गार 

 श्याम सुंदर ने बताया की  गांव की खाली पड़ी जमीन पर आंवला और एलोवीरा का पेड़ लगाया जाता है।  अब तक  50 हज़ार से ज़्यादा पेड़ लगाए जा चुके हैं।  इस के पीछे लोगों को रोज़गार देने की नियत थी और आज  गांव की महिलाएं पूरे तौर पर आत्म निर्भर हो चुकी है। एलोवीरा की फसल तैयार होने के बाद  एलोवीरा प्रोसेसिंग प्लांट लगाया गया अब गांव की महिलाएं एलोवीरा से जूस, क्रीम आदि तैयार करके उन्हें बाजार में बेचने लगीं हैं।  

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